गोरखपुर: पीडी और आईडी में उलझे हैं 300 से ज्यादा उपभोक्ता, लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे उपभोक्ता
कहीं दूसरी जगह रहने या मकान बेचने की स्थिति में बिजली कनेक्शन की पीडी (स्थाई विच्छेदन) करवानी होती है। इसके लिए पहले उन्हें खंड कार्यालय जाकर अपनी आईडी ( खाता संख्या) पर उपभोग किए बिजली बिल का पूरा भुगतान ( शून्य) करना होता है।
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बिजली निगम के जिम्मेदारों की लापरवाही का खामियाजा शहरी खंड के 300 से अधिक उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है। इन उपभोक्ताओं ने वर्षों पहले अपना कनेक्शन कटवा दिया, लेकिन निगम के लिपिक और जिम्मेदार अभियंता अपने निजी लाभ के लिए उन्हें भी बकाएदार बनाए हुए हैं।
इन सभी की आईडी ( खाता संख्या) आज भी चल रही है। इसकी वजह से ये उपभोक्ता अब लाखों के बकाएदार हो गए हैं। वसूली के लिए उनके घर अमीन पहुंचने लगे हैं। परेशान उपभोक्ता बिजली दफ्तर का चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
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पीडी के बाद आईडी बंद करवाना जरूरी
दरअसल, कहीं दूसरी जगह रहने या मकान बेचने की स्थिति में बिजली कनेक्शन की पीडी (स्थाई विच्छेदन) करवानी होती है। इसके लिए पहले उन्हें खंड कार्यालय जाकर अपनी आईडी ( खाता संख्या) पर उपभोग किए बिजली बिल का पूरा भुगतान ( शून्य) करना होता है।
इसी के बाद पीडी की प्रक्रिया की जाती है। इसके लिए खंड दफ्तर पर आवेदन शुल्क ( घरेलू कनेक्शन 300 रुपये, कॉमर्शियल कनेक्शन 500 रुपये) जमा करने पर खंड की तरफ से ओएम ( ऑफिस मेमोरेंडम) की एक प्रति उपभोक्ता और दूसरी क्षेत्र के अवर अभियंता को डाक से भेजी जाती है।
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डाक मिलने के बाद जेई, उपभोक्ता के परिसर पर टंगा मीटर उतारता है और पीली पर्ची देता है। इसी पर्ची और ओएम के साथ जेई, पीडी फार्म को भरकर खुद और लाइनमैन के हस्ताक्षर से पीडी का सत्यापन करता है। इसके बाद पीडी की फाइल पहले उपखंड के एसडीओ के पास जाती है, वहां सत्यापित होने के बाद अधिशासी अभियंता खंड के सर्वर से उपभोक्ता की आईडी (नाम-खाता संख्या) डिलीट कर दी जाती है। इसमें किसी एक जगह भी कागज फंस गया तो आईडी चलती रहेगी और बिल बनता जाएगा, इसे बंद करवाना जरूरी होता है, वरना इसी का फायदा उठाया जाता है।
सुविधा शुल्क के लिए अभियंता ऐसे करते हैं खेल
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ऐसे में अभियंता, उपभोक्ता के परिसर से मीटर जिस वर्ष हटाया गया था, उसी समय से कनेक्शन को खत्म मानकर बिल में संशोधन कर देते हैं। बताया कि इस संशोधन को पूरी सेटिंग के साथ किया जाता है। इससे उपभोक्ता को लगता कि उनकी परेशानी खत्म हो गई और निगम के जिम्मेदारों को सुविधा शुल्क मिल जाता है अलग से।
अधीक्षण अभियंता शहरी यूसी वर्मा ने कहा कि विभागीय प्रक्रिया है कि उपभोक्ता के कनेक्शन को नियमानुसार निपटाया जाए। पीडी के लिए आवेदन करने पर जांच के बाद उसे आगे बढ़ाया जाता है। लापरवाही होने की वजह से ही पीडी के मामले लंबित रह जाते हैं। इसमें सुधार की जरूरत है। उच्चाधिकारियों से इस संबंध में चर्चा कर जरूरी दिशा निर्देश जारी करवाया जाएगा।