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इस दर्दनाक कहानी को पढ़कर भर आएंगी आपकी आंखें, जानिए एक घिनौनी साजिश ने कितनों को कर दिया तबाह

Sat, 24 Oct 2020 04:38 PM IST
vivek shukla शिवम सिंह/राहुल कुमार सिंह/दिनेश श्रीवास्तव गोरखपुर।
शिवम सिंह/राहुल कुमार सिंह/दिनेश श्रीवास्तव गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 24 Oct 2020 04:38 PM IST
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Punishment Without Crime many people stressed due to police negligence matter of fact in gorakhpur
साजिशों का कटा जाल, पर अब भी हैं कई मलाल। - फोटो : अमर उजाला।
बेआबरू हुए, अपनों की नजरों में गिरे, कंगाल हुए और पेशानी पर वह पहचान चस्पा हो गई, जिससे उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं था। जीते जी मार देने वाली यह कहानी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के हर उस शख्स की है, जो किसी की घिनौनी साजिश का शिकार हो गया। एक साजिश ने उसे कातिल बना दिया। दुष्कर्मी बना दिया। और न जाने कैसी-कैसी घिनौनी पहचान उस पर जमाने और पुलिस की कलम ने चस्पा कर दी।
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कुछ पर ऊपर वाले की मेहर हुई और पुलिस की कलम की इबारत बदल गई। नतीजा, अब वे पुलिस के कागजों में कातिल नहीं हैं, न ही दुष्कर्मी। ये उनके लिए अंतहीन काली रात के दौरान सुबह होने जैसा है। मगर, इस रात की सुबह नहीं होती तो...? पूरी जिंदगी जेल में गुजरती, परिवार तिल-तिल मरता। अब जब वह स्याह रात गुजर गई तो उनके दिल में बस एक मलाल है, जिसने उनकी और उनके अपनों की जिंदगी को दोजख बना दिया, क्या उनसे कोई सवाल करेगा? क्या उनकी करनी का कोई फल उन्हें कभी मिलेगा? उन पुलिस वालों का क्या होगा, जो किसी साजिशिए का हथियार बन गए?
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पीड़ितों के मन में सवालों का तूफान है। सबक सिखाने को सख्त कानून है, फिर भी जिम्मेदार पुलिस की कलम ऐसे घिनौने साजिशियों को सजा दिलाने के नाम पर नपुंसक क्यों हो जाती है? क्यों न्याय के बीज नहीं बो पाती? पुलिस अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी कौन बताएगा? उन पुलिसवालों को क्या कोई इनाम मिलेगा, जिन्होंने किसी फरिश्ते की तरह साजिश के शिकार उन जैसों की बिगड़ी तकदीर संवार दी? दिल को शीशे की मानिन्द किर्च-किर्च कर देने वाले ये तमाम अहसास और सवाल, अमर उजाला को उन्हीं वक्त के मारों से मिले, जिनका वजूद साजिश के जाल में फंसकर तिनके की तरह बिखर गया। आइए दिल को छू लेने वाले ऐसे ही कुछ अहसास आपसे साझा करते हैं। हम दुआ करते हैं और आप भी करें कि ऐसे दिन किसी को न दिखाए। तो चलिए आज एक अनछुए-अनदेखे सफर पर-
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केस- 1

जिले के चिलुआताल के बरगदवां निवासी सुनील दुष्कर्म के आरोप में जेल में हैं। उनकी पत्नी गुड़िया ने बताया कि एडीजी से लेकर लखनऊ तक दौड़ लगाई तब जाकर जांच के आदेश भईल और उ निर्दोष पाइल गइले। मगर अबो जेल में ही बांटे। दरअसल, करीब दो साल पहले जमीन के विवाद में दूसरे पक्ष ने एक महिला को दलित बनाकर पेट्रोल पंप पर काम करने वाले भाइयों अनिल और सुनील पांडेय पर दलित उत्पीड़न, दुष्कर्म की धारा में केस दर्ज कराया।

आरोप था कि वह बर्तन मांजने के लिए बरगदवां आती थी और उस समय ही उसके साथ घटना की गई। दलित उत्पीड़न का मामला होने की वजह से सीओ कैंपियरगंज ने विवेचना की थी। एडीजी के आदेश पर दोबारा जांच हुई तो पता चला कि महिला दलित नहीं मुस्लिम है और वह संतकबीरनगर की रहने वाली है, जहां से रोज आकर बर्तन साफ कर पाना संभव नहीं है। उसकी उम्र भी 55 से ऊपर और एफआईआर में उसने खुद को 35 साल बताया था। दुष्कर्म का मामला गलत पाया गया।

केस-2
शहर के शाहपुर इलाके में सेंट जॉन गली में शिक्षिका डेविना उर्फ निवेदिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। बेटी को भी गोली लगी थी। उस समय चश्मदीद कोई नहीं था, लेकिन बाद में पति ने ज्ञानू तिवारी समेत तीन लोगों पर लूट की कोशिश के लिए गोली मारकर हत्या करने का केस दर्ज कराया था। वजह बताया गया था कि इनसे विवाद चल रहा था। उसी दिन से पुलिस ने ज्ञानू तिवारी, उनकी पत्नी व एक महिला रिश्तेदार को हिरासत में लिया और जांच में उनकी नामजदगी गलत पाई गई। शहर के शूटर पकड़े गए, जिन्होंने वारदात को अंजाम दिया था।

केस-3

हरपुर बुदहट इलाके में सुधीर पर छेड़खानी का केस दर्ज हुआ था। दरअसल, सुधीर ने एक गरीब दुष्कर्म पीड़िता की मदद कर दी थी। यही वजह थी कि आरोपी की बहन ने उसे फंसाने के लिए दुष्कर्म का झूठा केस दर्ज करा दिया। वह मुल्जिम बन गया। अच्छा सिर्फ यही था कि पुलिस ने इस मामले में सच्चाई की जांच की तो पता चला कि जिस समय की घटना बताई जा रही है उससे कुछ देर पहले वह मां के साथ अस्पताल में था। घटना के वक्त वह दोस्त के घर था, जिसका सीसी टीवी फुटेज मिल गया। इसके अलावा उसकी मोबाइल लोकेशन भी घटनास्थल पर नहीं मिली।

केस-4
जिंदगी में बच्चों की बेहतरी और परिवार का सुख कौन नहीं चाहता है। पर यही चाहत शाहपुर इलाके के रहने वाले रेलकर्मी राकेश की जिंदगी में सुकून कम और आफत ज्यादा लेकर आई। राकेश ने एक जमीन खरीदी थी। आसपास कब्जा था तो सोचा कि सरकारी महकमे को जगाया जाए। फिर क्या प्रापर्टी डीलर पीछे पड़ गए। एक से एक गंभीर धाराओं में केस दर्ज कराया गया। दो मामलों में फाइल रिपोर्ट लग चुकी है, जबकि तीसरे मामले की विवेचना देवरिया में चल रही है।

सबक सिखाने के लिए सख्त कानून है, पर पुलिस की कलम नहीं चलती

गोरखपुर पुलिस का वर्षों पुराना रिकॉर्ड खंगाल डालिए, मगर आईपीसी की धारा-194,195 के तहत कार्रवाई की शायद ही कोई बानगी मिले। यही वजह है कि झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता और गोरखपुर में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।  

आईपीसी की धारा 194:  यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से दंडनीय किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह आजीवन कारावास या कठिन कारावास से जो 10 वर्ष तक हो सकती है और जुर्माने से दंडित होगा।
आईपीसी की धारा 195: जो भी कोई इस आशय से या यह संभाव्य जानते हुए कि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए, जो मृत्यु से दंडनीय न हो किंतु आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय हो, दोषसिद्ध कराने के लिए, मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, उसे भी वैसे ही दंडित किया जाएगा, जैसे आरोपी व्यक्ति के लिए दंडनीय तय होता है।
आईपीसी की धारा 177:  जानबूझकर गलत सूचना देकर केस दर्ज कराना। इसमें छह महीने सजा और जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।

कानून में व्यवस्था मौजूद पर जिम्मेदार कतराते हैं
महिला अपराध के मामलों में खासकर, कोई पुलिस वाला रिस्क नहीं लेता। केस दर्ज किया और भेज दिया जेल। जिसे समझना है कोर्ट से समझे? कुछ मामलों में आला अधिकारियों के हस्तक्षेप पर जांच होती है, तब कहीं राहत मिलती है। मामला गलत पाए जाने के बावजूद पुलिस झूठी एफआईआर दर्ज कराने के दोषी पर कार्रवाई नहीं करती। जबकि, झूठा केस करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन जिम्मेदार अपना काम करना नहीं चाहते हैं।

एडीजी जोन दावा शेरपा ने बताया कि दुष्कर्म, छेड़खानी या अन्य धाराओं में फर्जी केस दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई पुलिस को करनी होती है। फर्जी तरीके से फंसाने की कई शिकायतें भी सामने आती हैं। ऐसे मामलों की बारीकी से जांच कराई जाएगी। यदि पुलिसकर्मी की संलिप्तता मिली तो उस पर भी कार्रवाई की जाएगी। सभी एसएसपी या एसपी को इसका पालन सुनिश्चित कराना होगा।
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