राखी का धागा रह गया, भाई चला गया: दस दिन पहले जिसकी कलाई पर बहन ने बांधा रक्षासूत्र, वही हमेशा के लिए बिछड़ा
देवास से दिल्ली पढ़ाई करने आया अर्पित सत्य निकेतन हादसे में मारा गया। रक्षाबंधन मनाकर लौटा अर्पित परिवार का इकलौता बेटा था। एम्स में मां का रो-रोकर बुरा हाल है।
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रक्षाबंधन को अभी दस दिन भी नहीं बीते थे। देवास के घर में त्योहार की रौनक बाकी थी। अर्पित दिल्ली से घर पहुंचा था। बहन ने राखी बांधी, भाई ने हंसी-ठिठोली की। मां ने बेटे को अपने पास देखा तो घर की खुशियां लौट आई थीं। किसी को नहीं पता था कि यह खुशी इतनी जल्दी मातम में बदल जाएगी।
शनिवार रात अर्पित फिर दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठा। घर से निकलते वक्त मां ने उसे विदा किया। वह रोज की तरह पढ़ाई और भविष्य के सपनों के लिए दिल्ली लौट रहा था। मां को उम्मीद थी कि बेटा दिल्ली पहुंचकर फोन करेगा और कुछ दिनों बाद फिर घर आएगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह बेटे की आखिरी विदाई है।
सत्य निकेतन हादसे में अर्पित की मौत की खबर सुनकर परिवार दिल्ली पहुंचा। एम्स ट्रॉमा सेंटर की मोर्चरी के बाहर अर्पित के चाचा अर्जुन बेटे की मां की हालत बताते-बताते रो पड़े। उनके पास बैठी मां बार-बार बिलख रही थीं। कभी बेटे को पुकारतीं, कभी चुप हो जातीं। उनकी चीखें मोर्चरी के बाहर पसरी खामोशी को चीर रही थीं। लोग उन्हें संभाल रहे थे, लेकिन मां का दर्द संभलने का नाम नहीं ले रहा था। जिस बेटे को कुछ घंटे पहले तक उन्होंने फोन पर सुना था, अब वह सामने था, लेकिन हमेशा के लिए खामोश।
एम्स ट्रॉमा सेंटर की मोर्चरी के बाहर सोमवार को सिर्फ अर्पित का परिवार नहीं था। वहां कई परिवार अपने-अपने बच्चों की तलाश और पहचान के लिए पहुंचे थे। किसी ने इकलौता बेटा खोया था, किसी ने भाई और किसी ने दोस्त। मोर्चरी के बाहर चीख-पुकार थी तो कुछ दूरी पर छात्र गुमसुम बैठे थे। उनके बीच बातचीत नहीं हो रही थी। जैसे हादसे ने सबकी आवाज छीन ली हो।
हादसे वाले दिन सुबह आया था अर्पित
अर्पित रक्षाबंधन मनाकर शनिवार रात देवास से दिल्ली के लिए रवाना हुआ था। हादसे वाले दिन सुबह करीब आठ बजे वह पीजी पहुंचा था। दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में बीकॉम सेकेंड ईयर की पढ़ाई कर रहा अर्पित मध्य प्रदेश के देवास से बेहतर भविष्य का सपना लेकर दिल्ली आया था। अर्पित के चाचा अर्जुन ने बताया कि शनिवार रात परिवार ने उसे ट्रेन में बैठाया था। घर से निकलते समय मां ने उसे विदा किया था। घर में किसी को अंदाजा नहीं था कि अगली बार अर्पित की खबर इस तरह आएगी। अर्पित अपनी बहन से छोटा और परिवार का इकलौता बेटा था। पढ़ाई पूरी कर कॅरिअर बनाने की उम्मीदें उसके साथ जुड़ी थीं। रक्षाबंधन पर बहन ने जिस भाई की कलाई पर राखी बांधी थी, वही भाई कुछ दिनों बाद परिवार से हमेशा के लिए दूर हो गया। मोर्चरी के बाहर अर्पित की मां की हालत देखकर वहां मौजूद दूसरे लोगों की आंखें भी नम हो गईं। अनजान लोग भी उनके दर्द में शामिल हो गए।
दोपहर 12 बजे मां से वीडियो कॉल पर हुई थी बात
सुबह पीजी पहुंचने के बाद अर्पित ने परिजनों को इसकी जानकारी दी थी। दोपहर करीब 12 बजे मां से उसकी वीडियो कॉल पर बात हुई। करीब दो बजे मां ने दोबारा वीडियो कॉल किया। फोन नहीं उठा। सामान्य कॉल भी की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मां ने सोचा कि रातभर ट्रेन में सफर करने की वजह से अर्पित सो रहा होगा। कुछ देर बाद दोस्तों से सत्य निकेतन हादसे की जानकारी मिली तो परिवार की चिंता बढ़ गई। अर्जुन के मुताबिक, सूचना मिलते ही वह फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। पहले एम्स ट्रॉमा सेंटर गए, लेकिन अर्पित के बारे में जानकारी नहीं मिली। वहां से घटनास्थल भेजा गया। घटनास्थल पर भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले। परिवार करीब 10-12 घंटे तक अर्पित को तलाशता रहा। हर जगह उम्मीद थी कि शायद वह मिल जाए।
बिलखती मां बोली-आखिर दिल्ली क्यों आने दिया
अर्पित की मां ने रोते हुए बताया कि दिल्ली लौटते समय रेलवे स्टेशन पर उसकी बहन को छींक आई थी। उन्होंने इसे अशुभ संकेत मानकर अर्पित से यात्रा टालने को कहा था। लेकिन अर्पित ने कहा कि टिकट कंफर्म है और कक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। अब मां को इसी फैसले का अपराधबोध सता रहा है। रोते हुए वह कहती रहीं, मैंने उसे दिल्ली क्यों जाने दिया?
दोस्ती का साथ हमेशा के लिए छूटा
सत्य निकेतन हादसे में मोती लाल नेहरू कॉलेज के शौर्य और माधव ने अपने दोस्त अभिषेक कुमार को भी खो दिया। एम्स ट्रॉमा सेंटर की मॉच्र्युरी के बाहर दोनों दोस्त काफी देर तक गुमसुम बैठे रहे। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र का रहने वाला अभिषेक बीकॉम प्रोग्राम सेकेंड ईयर का छात्र था। दोस्तों के मुताबिक, वह बेहद शांत स्वभाव का था। ज्यादा बोलता नहीं था, लेकिन जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद जरूर करता था। अभिषेक का सपना ग्रेजुएशन के बाद सरकारी अधिकारी बनने का था। दोस्तों ने बताया कि वह अपने भविष्य को लेकर गंभीर था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा था। अब उसके दोस्तों के पास उसकी यादें हैं और वह सपना, जो हादसे के साथ हमेशा के लिए टूट गया।
क्लासमेट से रूममेट का सफर हमेशा के लिए खत्म
अभिषेक इसी साल पीजी में शिफ्ट हुआ था। इससे पहले वह मदर डेयरी लेन में रह रहा था। दोस्तों ने बताया कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से कुछ समय से वह कॉलेज भी नहीं आ रहा था। वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ना चाहता था, लेकिन बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में उसका चयन हो गया। हादसे में मोती लाल नेहरू कॉलेज के ही युवराज ने भी जान गंवाई। छत्तीसगढ़ के दुर्ग निवासी युवराज बीकॉम सेकेंड ईयर के छात्र थे। अभिषेक और युवराज एक ही कक्षा में पढ़ते थे। पढ़ाई के साथ उनकी दोस्ती भी गहरी थी। दोनों एक ही कमरे में रहते थे। हादसे के वक्त वे ढही इमारत के टॉप फ्लोर पर थे। हादसे से पहले युवराज की दोपहर करीब डेढ़ बजे फोन पर बात भी हुई थी। इसके बाद सबकुछ खत्म हो गया। सोमवार को दोनों के परिजन पोस्टमार्टम के लिए एम्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचे।
हादसे ने परिवार से छीना इकलौता बेटा
मध्य प्रदेश के कटनी के रहने वाले अक्षत सिंह भी हादसे में जान गंवाने वाले छात्रों में शामिल थे। वह पीजीडीएवी कॉलेज में बीकॉम सेकेंड ईयर के छात्र थे और इमारत की टॉप फ्लोर पर रहते थे। अक्षत के रिश्तेदार दीपांकर के मुताबिक, परिवार में माता-पिता और बहन हैं। वह अपनी बहन से बड़ा था। करीब एक साल पहले पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था और करीब एक साल से हॉस्टल में रह रहा था। माता-पिता ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में बेटे को दिल्ली भेजा था। अब वही बेटा ताबूत में घर लौटेगा। परिवार के लिए हादसा सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि भविष्य की उन तमाम उम्मीदों का टूटना है, जो अक्षत के साथ जुड़ी थीं।
परिजन को खोजने में हुई दिक्कत
एम्स ट्रॉमा सेंटर की मॉच्र्युरी के बाहर छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी मौजूद थे। वे परिजनों की मदद करने के साथ उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे थे। अस्पताल में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। मॉच्र्युरी की ओर जाने वाले रास्ते पर बैरिकेडिंग थी। अर्द्धसैनिक बल के जवानों के साथ दिल्ली पुलिस और अस्पताल के सुरक्षाकर्मी तैनात थे। ट्रॉमा सेंटर का इलाका सुरक्षा घेरे में था। दूसरी तरफ अपने बच्चों और परिजनों की जानकारी के लिए घंटों भटक रहे परिवारों में नाराजगी भी थी।