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स्वछता सर्वे में स्कूल फेल
Updated Tue, 16 Jan 2018 01:05 AM IST
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स्वच्छता के सर्वे में स्कूल फेल
गाजियाबाद। स्वच्छता के सर्वे में सरकारी और निजी स्कूल फेल हो गए हैं। भारत मिशन के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय व यूनिसेफ के संयुक्त सर्वे में स्कूलों की पोल खुली है। पढ़ाई के नाम मोटी फीस वसूलने वाले पब्लिक स्कूलों में न पर्याप्त शौचालय हैं और न ही पीने के पानी को लेकर जागरूकता। जिले के किसी भी सरकारी व पब्लिक स्कूल में दिव्यागों के लिए समुचित शौचालय की व्यवस्था नहीं है। अगर शौचालय बने भी हैं तो उनमें दिव्यांगों के लिए ठोस इंतजाम नहीं है। सरकारी विद्यालय जिनमें शिक्षकों की तनख्वाह पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, उनकी हालत बेहद खराब है। कोई भी स्कूल पीने के पानी की जांच नहीं कराता।
सर्वे के दौरान कोई भी सरकारी व पब्लिक पानी जांच की रिपोर्ट नहीं दे पाया। अक्तूबर व नवंबर 2017 में सर्वे किया गया, जिसमें गाजियाबाद के पांच विद्यालय भी सूबे के शीर्ष 35 में भी स्थान नहीं बना पाए हैं। एक मात्र खेतान पब्लिक स्कूल साहिबाबाद को प्रदेश में 39वीं रैंक मिली है। जिसका भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। यूनिसेफ के गाजियाबाद समन्वयक राजीव कुमार ने बताया कि मंत्रालय ने यूनिसेफ के सहयोग से पूरे सूबे में सर्वे कराया है। जिसमें स्कूलों में बच्चों को मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं से जुड़े 50 प्रश्नों के सवाल ऑनलाइन पूछे गए। यूपी के कुल 2,64,896 स्कूलों से फार्म भरवाए गए, जिसमें गाजियाबाद के 1752 स्कूलों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया था। लेकिन 1158 स्कूलों ने ही ऑनलाइन फार्म भरकर सवालों के जवाब दिए। इनमें 608 सरकारी और 550 प्राइवेट शामिल हुए। राजीव कुमार ने बताया कि सर्वे में शामिल किसी भी सरकारी स्कूल ने पानी की जांच संबंधी सवाल का जवाब नहीं दिया। वहीं, प्राइवेट स्कूलों ने पानी की जांच कराने की बात जरूर कही लेकिन कोई भी जांच रिपोर्ट नहीं दे सका। जबकि स्कूलों से वर्ष भर की जांच रिपोर्ट मांगी गई थी।
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दिव्यांग को शौचालय की सुविधा नहीं
सर्वे में चौंकाने वाली बता यह भी निकल कर आई है कि किसी भी सरकारी विद्यालय में दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय नहीं है। निजी स्कूलों ने अपने यहां दिव्यांग शौचालय होने की बात जरूर कही, लेकिन यह नहीं बता पाए कि क्या सुविधा दिव्यांगों से जुड़े शौचालय में दे रहे हैं। क्योंकि दिव्यांगों के लिए शौचालय में बैठने व उठने के लिए अलग तरह के इंतजाम करने होते हैं। जवाब नहीं देने से साफ है कि निजी विद्यालयों में भी महज खानापूर्ति हो रही है।
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न साबुन और न डस्टबिन उपलब्ध
सर्वे में निकल कर आया है कि निजी व सरकारी विद्यालयों के शौचालयों में डस्टबिन व साबुन तक नहीं है। निजी विद्यालय में कुछ जगहों पर जरूर साबुन उपलब्ध है, लेकिन सरकारी विद्यालयों में स्थिति बेहद खराब है।
594 स्कूल पंजीकरण कराकर पीछे हटे
सर्वे में 594 स्कूल ऐेसे हैं जिन्होंने सर्वे के लिए पंजीकरण कराया, लेकिन वह शामिल नहीं हुए। उन्होंने सवालों का जवाब नहीं दिया। इनमें सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के स्कूल शामिल हैं।
इनसेट
स्कूलों से पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण सवाल:
- बच्चों की संख्या के मुकाबले शौचालय की संख्या
- स्कूल में बने शौचालयों में पानी की क्या व्यवस्था है
- स्कूल में दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शौचालय है या नहीं
- शौचालय में छात्राओं के लिए क्या-क्या सुविधाएं हैं
- शौचालय में हाथ धोने के साबुन उपलब्ध है या नहीं
- बच्चों के पीने के पानी की क्या व्यवस्था है
- बच्चे जो पानी पी रहे हैं वह पीने योग्य है या नहीं, उसकी टेस्ट रिपोर्ट की जानकारी
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इनसेट
- सर्वे में कई सवाल ऐसे पूछे गए थे, जिन सुविधाओं के लिए प्रदेश व केंद्र सरकार बजट ही जारी नहीं करती। दिव्यांगों के लिए विशेष शौचालय बनवाने व पानी जांच कराने संबंधी कई सवाल ऐसे थे जिसका जवाब देने में हम अक्षम रहे। सवाल का जवाब क्यों नहीं दे सके, यह बातें हमने फार्म में बता दी थी। यही वजह है कि हमें बेहतर अंक नहीं मिल सके। - विनय कुमार - बीएसए
- स्वच्छता में हमारे स्कूल बेहतर हैं, लेकिन सर्वे में कई सवाल ऐसे थे, जिसका जवाब देना मुश्किल था। झूठा जवाब देने की बजाय सच बताकर उन बातों पर आगे अमल करना बेहतर समझा गया। मसलन एक सवाल था कि शौचालय में छात्राओं का दुपट्टा रखने के लिए हुक लगा हुआ है या नहीं, इसका जवाब देने में कई स्कूल असफल रहे। साथ ही पानी की जांच रिपोर्ट भी जल्दबाजी में उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। शायद यह वजह रही कि बेहतर व्यवस्था के बावजूद हम अंक हासिल नहीं कर सके। - सुभाष जैन, अध्यक्ष इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन
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गाजियाबाद। स्वच्छता के सर्वे में सरकारी और निजी स्कूल फेल हो गए हैं। भारत मिशन के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय व यूनिसेफ के संयुक्त सर्वे में स्कूलों की पोल खुली है। पढ़ाई के नाम मोटी फीस वसूलने वाले पब्लिक स्कूलों में न पर्याप्त शौचालय हैं और न ही पीने के पानी को लेकर जागरूकता। जिले के किसी भी सरकारी व पब्लिक स्कूल में दिव्यागों के लिए समुचित शौचालय की व्यवस्था नहीं है। अगर शौचालय बने भी हैं तो उनमें दिव्यांगों के लिए ठोस इंतजाम नहीं है। सरकारी विद्यालय जिनमें शिक्षकों की तनख्वाह पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, उनकी हालत बेहद खराब है। कोई भी स्कूल पीने के पानी की जांच नहीं कराता।
सर्वे के दौरान कोई भी सरकारी व पब्लिक पानी जांच की रिपोर्ट नहीं दे पाया। अक्तूबर व नवंबर 2017 में सर्वे किया गया, जिसमें गाजियाबाद के पांच विद्यालय भी सूबे के शीर्ष 35 में भी स्थान नहीं बना पाए हैं। एक मात्र खेतान पब्लिक स्कूल साहिबाबाद को प्रदेश में 39वीं रैंक मिली है। जिसका भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। यूनिसेफ के गाजियाबाद समन्वयक राजीव कुमार ने बताया कि मंत्रालय ने यूनिसेफ के सहयोग से पूरे सूबे में सर्वे कराया है। जिसमें स्कूलों में बच्चों को मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं से जुड़े 50 प्रश्नों के सवाल ऑनलाइन पूछे गए। यूपी के कुल 2,64,896 स्कूलों से फार्म भरवाए गए, जिसमें गाजियाबाद के 1752 स्कूलों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया था। लेकिन 1158 स्कूलों ने ही ऑनलाइन फार्म भरकर सवालों के जवाब दिए। इनमें 608 सरकारी और 550 प्राइवेट शामिल हुए। राजीव कुमार ने बताया कि सर्वे में शामिल किसी भी सरकारी स्कूल ने पानी की जांच संबंधी सवाल का जवाब नहीं दिया। वहीं, प्राइवेट स्कूलों ने पानी की जांच कराने की बात जरूर कही लेकिन कोई भी जांच रिपोर्ट नहीं दे सका। जबकि स्कूलों से वर्ष भर की जांच रिपोर्ट मांगी गई थी।
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दिव्यांग को शौचालय की सुविधा नहीं
सर्वे में चौंकाने वाली बता यह भी निकल कर आई है कि किसी भी सरकारी विद्यालय में दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय नहीं है। निजी स्कूलों ने अपने यहां दिव्यांग शौचालय होने की बात जरूर कही, लेकिन यह नहीं बता पाए कि क्या सुविधा दिव्यांगों से जुड़े शौचालय में दे रहे हैं। क्योंकि दिव्यांगों के लिए शौचालय में बैठने व उठने के लिए अलग तरह के इंतजाम करने होते हैं। जवाब नहीं देने से साफ है कि निजी विद्यालयों में भी महज खानापूर्ति हो रही है।
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न साबुन और न डस्टबिन उपलब्ध
सर्वे में निकल कर आया है कि निजी व सरकारी विद्यालयों के शौचालयों में डस्टबिन व साबुन तक नहीं है। निजी विद्यालय में कुछ जगहों पर जरूर साबुन उपलब्ध है, लेकिन सरकारी विद्यालयों में स्थिति बेहद खराब है।
594 स्कूल पंजीकरण कराकर पीछे हटे
सर्वे में 594 स्कूल ऐेसे हैं जिन्होंने सर्वे के लिए पंजीकरण कराया, लेकिन वह शामिल नहीं हुए। उन्होंने सवालों का जवाब नहीं दिया। इनमें सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के स्कूल शामिल हैं।
इनसेट
स्कूलों से पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण सवाल:
- बच्चों की संख्या के मुकाबले शौचालय की संख्या
- स्कूल में बने शौचालयों में पानी की क्या व्यवस्था है
- स्कूल में दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शौचालय है या नहीं
- शौचालय में छात्राओं के लिए क्या-क्या सुविधाएं हैं
- शौचालय में हाथ धोने के साबुन उपलब्ध है या नहीं
- बच्चों के पीने के पानी की क्या व्यवस्था है
- बच्चे जो पानी पी रहे हैं वह पीने योग्य है या नहीं, उसकी टेस्ट रिपोर्ट की जानकारी
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इनसेट
- सर्वे में कई सवाल ऐसे पूछे गए थे, जिन सुविधाओं के लिए प्रदेश व केंद्र सरकार बजट ही जारी नहीं करती। दिव्यांगों के लिए विशेष शौचालय बनवाने व पानी जांच कराने संबंधी कई सवाल ऐसे थे जिसका जवाब देने में हम अक्षम रहे। सवाल का जवाब क्यों नहीं दे सके, यह बातें हमने फार्म में बता दी थी। यही वजह है कि हमें बेहतर अंक नहीं मिल सके। - विनय कुमार - बीएसए
- स्वच्छता में हमारे स्कूल बेहतर हैं, लेकिन सर्वे में कई सवाल ऐसे थे, जिसका जवाब देना मुश्किल था। झूठा जवाब देने की बजाय सच बताकर उन बातों पर आगे अमल करना बेहतर समझा गया। मसलन एक सवाल था कि शौचालय में छात्राओं का दुपट्टा रखने के लिए हुक लगा हुआ है या नहीं, इसका जवाब देने में कई स्कूल असफल रहे। साथ ही पानी की जांच रिपोर्ट भी जल्दबाजी में उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। शायद यह वजह रही कि बेहतर व्यवस्था के बावजूद हम अंक हासिल नहीं कर सके। - सुभाष जैन, अध्यक्ष इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन
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