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Delhi : विकास के लिए पर्यावरण नियम दरकिनार, दिल्ली रिज में नियमों की अनेदखी कर किया जा रहा है निर्माण
Wed, 11 Sep 2024 05:44 AM IST
दुष्यंत शर्मा
आशीष सिंह, नई दिल्ली
आशीष सिंह, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 11 Sep 2024 05:44 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस क्षेत्र की हर चार में से तीन परियोजनाओं में तयशुदा नियमों की अवहेलना की गई है।
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कुतुब मीनार के पास रिज में निर्माण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली रिज वन क्षेत्र में चल रहीं परियोजनाओं में पर्यावरण नियमों की अनदेखी हुई है। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस क्षेत्र की हर चार में से तीन परियोजनाओं में तयशुदा नियमों की अवहेलना की गई है। इनमें केंद्रीय एजेंसियों के साथ दिल्ली सरकार, पुलिस व नगर निगम के प्रोजेक्ट भी शामिल हैं। सीईसी ने जिन 20 प्रोजेक्ट का आकलन किया, उसमें से 15 में पेड़ों की कटाई और उनका स्थानांतरण नियम-कायदों को दरकिनार करके किया गया है। सीईसी ने पिछले दिनों अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली के वन व रिज क्षेत्रों में चल रहीं परियोजनाओं ने कोर्ट के निर्धारित शर्तों का उल्लंघन किया है। इसमें कोर्ट की तरफ से लगाई गई शर्तों के अनुपालन तक का उचित रिकॉर्ड दिल्ली सरकार के वन विभाग और रिज प्रबंधन बोर्ड (आरएमबी) ने नहीं रखा है। वहीं, पिछले प्रस्ताव में लगाई गई शर्तों का भी एजेंसी को ख्याल नहीं रहा।
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कमेटी से सिफारिश की है कि पर्यावरण नियमों के पालन के लिए इन परियोजनाओं को छह महीने की छूट अवधि प्रदान की जानी चाहिए। इस बीच संबंधित एजेंसी के नए प्रस्तावों को लंबित रखा जाएगा। यदि तयशुदा समय के बाद भी एजेंसी शर्तों का पालन करने में नाकामी रहती है तो उनके खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
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इन एजेंसियों ने नहीं किया निर्देशों का पालन
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में एक छात्रावास का निर्माण, मैदानगढ़ी में साउथ एशियन विश्वविद्यालय (एसएयू) का निर्माण, ओखला के तेहखंड में अपशिष्ट से ऊर्जा संयंत्र का निर्माण, डीडीए का सीरी फोर्ट का प्रोजेक्ट, अणुव्रत मार्ग पर लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित एक फुट-ओवर ब्रिज, मालचा मार्ग पर रक्षा मंत्रालय की इमारत, नानकपुरा में दिल्ली पुलिस भवन, मैदानगढ़ी में एक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) परिसर, वसंत कुंज में एक एनबीसीसी इंडिया शिल्प परिसर परियोजना, एनसीआरटीसी के प्रोजेक्ट, वित्त मंत्रालय का प्रोजेक्ट, डीडीए का ट्वायलेट ब्लॉक समेत दूसरी समेत दूसरे पंद्रह प्रोजेक्ट।
इनमें शर्तों का पालन
धौला कुआं में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) परियोजना, दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड परियोजना, महिपालपुर में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) परियोजना और एक रेफरल एंड रिसर्च (आर एंड आर) सेना अस्पताल शामिल हैं।
समिति ने की इन बातों की सिफारिश
दिल्ली रिज से संबंधित मुद्दों पर न्यायालय द्वारा समय-समय पर पारित आदेशों का उचित और समय पर अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए, सीईसी एक अनुकूलित प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) मॉड्यूल तैयार करेगी। इस पर परियोजना प्रस्तावक द्वारा नियमित आधार पर डेटा अपलोड किया जाएगा। इसमें परियोजना का विवरण बताना होगा। वहीं, काटे जाने वाले या स्थानांतरित किए जाने वाले पेड़ों की संख्या और प्रजातियों का विवरण देना होगा। प्रतिपूरक पौधरोपण और उसके बाद की रखरखाव गतिविधियों का विवरण भी बताना होगा। सीईसी ने आरएमबी को आगे सिफारिश की है कि अगर कोई एजेंसी दिल्ली में पिछले प्रोजेक्ट की शर्तों को पूरा करने में विफल रही है, तो उसे किसी निर्माण परियोजना को अनुमति नहीं देनी चाहिए।
7777 हेक्टेयर में है रिज क्षेत्र
रिज या जंगल के भीतर निर्माण की अनुमति को पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सीईसी द्वारा मंजूरी देनी होती है। इसके बाद शीर्ष अदालत द्वारा अनुमति दी जाएगी। रिज के मामले में दिल्ली के रिज प्रबंधन बोर्ड (आरएमबी) को निर्माण और पेड़ों की कटाई की अनुमति भी देनी होती है।
जानकारी के मुताबिक, 1483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली दिल्ली का कुल 23.06 प्रतिशत हो गया है। 7,777 हेक्टेयर का रिज क्षेत्र चार हिस्सों में बंटा हुआ है। उत्तरी, दक्षिणी, केंद्रीय और दक्षिणी- केंद्रीय रिज। रिज क्षेत्र भी किसी एक सरकारी विभाग या एजेंसी के अधीन न होकर आधा दर्जन से भी अधिक विभागों एवं एजेंसियों के क्षेत्राधिकार में आता है।
रिज या वन क्षेत्र में निर्माण की अनुमति देना गलत है। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका अधिक होती है। अगर किसी को निर्माण की अनुमति दी जाती है, तो आवश्यक शर्तों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रयास किए जाने चाहिए। पेड़ोंं की कटाई और क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण पर ठीक तरह नजर नहीं रखी जा रही है। इस मामले में तो कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन किया जा रहा है।
-भवरीन कंधारी, पर्यावरण कार्यकर्ता