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अति पिछड़ों के अंडर करंट ने दिया कमल को ट्रैक, कश्यप, पाल, प्रजापति, सैनी ने खिलाया कमल

Sun, 12 Mar 2017 11:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ, अमित मुद्गल
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ, अमित मुद्गल Updated Sun, 12 Mar 2017 11:11 AM IST
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undar karant ne diya kamal ko traik, kashyap, paal, prajaapati, sainee ne khilaaya kamal
bjp

चुनावी महासमर में भाजपा की एकतरफा जीत में अति पिछड़ी जातियों का अंडर करंट महती भूमिका अदा कर गया। सपा जहां इस वर्ग को साध नहीं पाई तो बसपा यह भांप ही नहीं पाई कि इस वर्ग का एक तरफा वोट भाजपा को जा रहा है। इस वर्ग ने खास तौर में वेस्ट यूपी में भाजपा की जीत का ऐसा आधार तैयार कर दिया कि भाजपा जीत के ट्रैक पर बढ़ चली।

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उत्तर प्रदेश का सामाजिक तानाबाना इस तरह बुना गया है कि सभी दल अपने अपने जातिगत समीकरणों को साधकर ही चुनावी रण में उतरते हैं।  अपर कास्ट के यहां 20 , अनुसूचित जाति 24 सूबे में अल्पसंख्यक वोट 14 प्रतिशत हैं पर वेस्ट यूपी में यह लगभग बीस प्रतिशत है। अत्यंत या अति पिछड़ा वर्ग यहां लगभग 33 प्रतिशत है। पूरे प्रदेश में जहां निषाद, मछुआरा, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, कुर्मी, पटेल आदि हैं तो वेस्ट यूपी में पाल, प्रजापति, विश्वकर्मा, लुहार, सैनी, कश्यप, धींवर, खटीक, वाल्मीकि आदि का ही वोट 20 प्रतिशत के पार है। हर सीट पर जबरदस्त दखलअंदाजी है।
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पिछड़ा, अति पिछड़े के खेल में उलझी सपा
सूबे की सपा सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग को तो साधने में पूरी ताकत लगा दी पर अति पिछड़े वर्ग को यह साध नहीं पाई। ओबीसी में तो सात बड़े मंत्री बांटे गए पर अति पिछड़ों को नजर अंदाज ही किया गया। खास तौर पर वेस्ट यूपी में इस तरफ नजर सपा ने कम ही रखी। अहम बात यह रही कि यादव, जाट आदि पिछड़े वर्ग के  नेताओं को मंत्री पद बांटकर सपा ने अति पिछड़ा वर्ग को और नाराज कर दिया। लोकसभा  चुनाव से लगातार अति पिछड़ा भाजपा के साथ चल रहा था। सपा ने फोकस करने की जहमत भी नहीं उठाई। जहां जहां भी सपा के सम्मेलन हुए, वहां मुस्लिम तथा पिछड़े वर्ग को फोकस किया गया। बसपा की रैलियों में दलित तथा मुस्लिम पर जोर रहा। उधर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में अति पिछड़े वर्ग पर फोकस किया गया। खास तौर पर मेरठ से पीएम ने रैली की शुरुआत की थी तो यहां भी इस वर्ग पर फोकस किया गया था। उधर मायावती ने भी यहीं अपनी चुनावी रैली का आगाज किया था लेकिन उनका फोकस भी दलितों के अलावा मुस्लिम तथा सोशल इंजीनियरिंग ही रहा। अति पिछड़े वर्ग पर फोकस करने में लापरवाही की गई।
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भाजपा ने साधा
कांग्रेस ने जरूर इस वर्ग को साधने की कोशिश की। मिस्त्री व खत्री केसहारे इस वर्ग को लुभाने की कोशिश की पर यह काम ही नहीं आया। यह केमेस्ट्री फेल हो गई है। उधर भाजपा ने स्वतंत्र देव सिंह (कुर्मी), धर्मपाल सिंह (लोधी), प्रकाश पाल (बघेल), केशव प्रसाद मौर्य को आगे कर तथा बार बार उनका नाम आगे लाकर इस वर्ग को साधने में सफलता पा ली। उधर बसपा ने भी इस वर्ग पर दांव नहीं चला। स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से रही सही कसर भी पूरी हो गई।


लोकसभा से मिली थी मजबूती
लोकसभा चुनाव से अति पिछड़ा वर्ग पूरी मुस्तैदी से भाजपा के साथ जमा है। मेरठ आसपास की 34 सीटों पर 10 से 22 प्रतिशत वोटों की उनकी यह उपस्थिति भाजपा को पूरी तरह से मजबूत कर गई। मेरठ की छह सीटों पर इस वर्ग ने भाजपा को एकतरफा वोट किया। खास तौर पर दक्षिण, सिवालखास, हस्तिनापुर, किठौर तथा सरधना सीट पर अति पिछड़ों केवोट में भाजपा के अलावा अन्य दल सहीं सेंध  नहीं लगा पाया। बिजनौर, शामली, बागपत, मुजफरनगर तथा सहारनपुर में भी यही स्थिति रही। उम्मीदवारों का लगातार इस वर्ग पर टारगेट करना भी भाजपा के इस  परिणाम का कारण रहा।

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