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सार्वजनिक आचरण के संदर्भ में सशस्त्र बल के सदस्य सामान्य नागरिक नहीं: हाईकोर्ट
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-छुट्टी पर रहते हुए सार्वजनिक सभा में भाषण देने वाले के विरुद्ध हाईकोर्ट का फैसला, याचिका खारिज
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने छुट्टी पर रहते हुए एक सार्वजनिक सभा में भाषण देने वाले सीआईएसएफ कांस्टेबल गुरनाम सिंह के विरुद्ध फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक आचरण और उत्तरदायित्व के संदर्भ में सशस्त्र बलों के सदस्य सामान्य नागरिक नहीं हैं। जस्टिस संदीप मौदगिल की पीठ ने आदेश में कहा राष्ट्र की अखंडता, सुरक्षा और एकता को बनाए रखने में उनकी भूमिका न केवल शारीरिक है, बल्कि नैतिक भी है।
वर्दी की ओर से प्रदान किए जाने वाले अधिकार और सम्मान के साथ, वर्दी के अंदर और बाहर, निष्पक्षता और गरिमा के साथ आचरण करने का दायित्व भी बढ़ जाता है। कोर्ट ने कहा कि जिसने संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली है फिर भी धार्मिक द्वेष के बीज बोने के लिए एक सार्वजनिक सभा के मंच का चयन करता है। वह उस ताने-बाने को नष्ट करता है जिसकी रक्षा करने का दायित्व उस पर है और ऐसे आचरण को हल्के में नहीं लिया जा सकता। किसी अधिकारी की ओर से किसी सभा को इस तरह संबोधित करना जिसे धार्मिक रूप से भड़काऊ माना जा सकता है न केवल पेशेवर अनुशासन, बल्कि सांविधानिक मूल्यों के साथ भी विश्वासघात है। पद और जिम्मेदारी जितनी ऊंची होगी आचरण का स्तर भी उतना ही ऊंचा होना अपेक्षित है। यह याद रखना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एक मौलिक अधिकार होते हुए भी पूर्ण नहीं है और इसके साथ उचित प्रतिबंध भी जुड़े होते हैं। खासकर जब यह घृणास्पद भाषण की सीमा तक पहुंच जाता है।
धार्मिक सभा में दिया था भड़काऊ भाषण
जून 2009 में चंडीगढ़ से एनटीपीसी-दादरी में स्थानांतरित होने के तुरंत बाद गुरनाम सिंह 10 दिनों का अर्जित अवकाश दिया गया था। छुट्टी के दौरान वह जालंधर स्थित अपने पैतृक गांव रानी भट्टी गए जहां उन्होंने कथित तौर पर एक धार्मिक सभा में भड़काऊ भाषण दिया। पंजाब के एडीजीपी-इंटेलिजेंस ने गुरनाम के आचरण के बारे में 23 जुलाई, 2009 को सीआईएसएफ को एक पत्र भेजा जिसके बाद सीआईएसएफ ने उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की। गुरनाम ने अपने खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। याची ने तर्क दिया कि कथित घटना के संबंध में पंजाब पुलिस की ओर से कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी। सीआईएसएफ अधिकारियों ने दलील दी कि पंजाब के एडीजीपी-इंटेलिजेंस से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी और बल के नियम इसके सदस्यों को सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने वाली बैठकों या प्रदर्शनों में भाग लेने से रोकते हैं। उच्च न्यायालय ने सीआईएसएफ कांस्टेबल गुरनाम सिंह की ओर से दायर एक याचिका खारिज कर दी जिसमें दंड के रूप में उनके वेतन में कटौती के विभागीय आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने छुट्टी पर रहते हुए एक सार्वजनिक सभा में भाषण देने वाले सीआईएसएफ कांस्टेबल गुरनाम सिंह के विरुद्ध फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक आचरण और उत्तरदायित्व के संदर्भ में सशस्त्र बलों के सदस्य सामान्य नागरिक नहीं हैं। जस्टिस संदीप मौदगिल की पीठ ने आदेश में कहा राष्ट्र की अखंडता, सुरक्षा और एकता को बनाए रखने में उनकी भूमिका न केवल शारीरिक है, बल्कि नैतिक भी है।
वर्दी की ओर से प्रदान किए जाने वाले अधिकार और सम्मान के साथ, वर्दी के अंदर और बाहर, निष्पक्षता और गरिमा के साथ आचरण करने का दायित्व भी बढ़ जाता है। कोर्ट ने कहा कि जिसने संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली है फिर भी धार्मिक द्वेष के बीज बोने के लिए एक सार्वजनिक सभा के मंच का चयन करता है। वह उस ताने-बाने को नष्ट करता है जिसकी रक्षा करने का दायित्व उस पर है और ऐसे आचरण को हल्के में नहीं लिया जा सकता। किसी अधिकारी की ओर से किसी सभा को इस तरह संबोधित करना जिसे धार्मिक रूप से भड़काऊ माना जा सकता है न केवल पेशेवर अनुशासन, बल्कि सांविधानिक मूल्यों के साथ भी विश्वासघात है। पद और जिम्मेदारी जितनी ऊंची होगी आचरण का स्तर भी उतना ही ऊंचा होना अपेक्षित है। यह याद रखना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एक मौलिक अधिकार होते हुए भी पूर्ण नहीं है और इसके साथ उचित प्रतिबंध भी जुड़े होते हैं। खासकर जब यह घृणास्पद भाषण की सीमा तक पहुंच जाता है।
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धार्मिक सभा में दिया था भड़काऊ भाषण
जून 2009 में चंडीगढ़ से एनटीपीसी-दादरी में स्थानांतरित होने के तुरंत बाद गुरनाम सिंह 10 दिनों का अर्जित अवकाश दिया गया था। छुट्टी के दौरान वह जालंधर स्थित अपने पैतृक गांव रानी भट्टी गए जहां उन्होंने कथित तौर पर एक धार्मिक सभा में भड़काऊ भाषण दिया। पंजाब के एडीजीपी-इंटेलिजेंस ने गुरनाम के आचरण के बारे में 23 जुलाई, 2009 को सीआईएसएफ को एक पत्र भेजा जिसके बाद सीआईएसएफ ने उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की। गुरनाम ने अपने खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। याची ने तर्क दिया कि कथित घटना के संबंध में पंजाब पुलिस की ओर से कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी। सीआईएसएफ अधिकारियों ने दलील दी कि पंजाब के एडीजीपी-इंटेलिजेंस से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी और बल के नियम इसके सदस्यों को सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने वाली बैठकों या प्रदर्शनों में भाग लेने से रोकते हैं। उच्च न्यायालय ने सीआईएसएफ कांस्टेबल गुरनाम सिंह की ओर से दायर एक याचिका खारिज कर दी जिसमें दंड के रूप में उनके वेतन में कटौती के विभागीय आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।
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