संवेदनहीनता: असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं असुरक्षित, 13 साल में नियम तक नहीं बना सका चंडीगढ़ प्रशासन
केंद्र की तरफ से बार बार याद दिलाने के बाद 2018 में 10 साल बाद बोर्ड बनाया गया था। अब उसका कार्यकाल खत्म होने जा रहा है लेकिन आज तक बोर्ड की एक बैठक तक नहीं हुई है।
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केंद्र सरकार ने वर्ष 2008 में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम बनाया। केंद्र की तरफ से कई बार निर्देश जारी करने के बाद चंडीगढ़ यूटी प्रशासन ने करीब 10 साल बाद चंडीगढ़ में 16 जुलाई 2018 को बोर्ड का गठन किया। अब इस बोर्ड का तीन वर्ष का कार्यकाल भी खत्म होने वाला है, लेकिन हैरानी की बात है कि आज तक इस बोर्ड ने एक भी बैठक नहीं की है। इसका नुकसान चंडीगढ़ के करीब डेढ़ लाख लोगों को हुआ है।
कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन का सबसे बुरा असर असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर पड़ा है। घरेलू कामगार, नाई, बीड़ी बनाने वाले श्रमिक, ऑटो चालक, रेहड़ी-फड़ी, दुकानों पर काम करने वाले श्रमिक आदि का कामकाज पूरी तरह से बंद हो गया। सभी घर बैठने को मजबूर हो गए। अगर प्रशासन के अधिकारी असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम-2008 को शहर में पूरी तरह से लागू करते तो इन मजदूरों की काफी मदद हो सकती है। उदाहरण के तौर पर चंडीगढ़ निर्माण कर्मकार बोर्ड ने निर्माण कार्य में लगे करीब पांच हजार कामगारों को 6000 हजार रुपये दिए थे। अगर असंगठित क्षेत्रों के लिए भी काम होता, लाभार्थियों को जोड़ा जाता तो इन्हें भी कुछ राशि मिल सकती थी।
असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सुरक्षा के लिए यूटी प्रशासन ने जो बोर्ड गठित किया था, उसके सदस्यों का कार्यकाल 15 जुलाई को खत्म होने वाला है। इसी से पता चलता है कि यूटी प्रशासन के अधिकारी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए किस कदर असंवेदनशील है।
एमएचए ने कई बार याद दिलाया, लेकिन नियम भी नहीं बनाए
असंगठित क्षेत्र में आते हैं ये लोग
घरेलू कामगार, महिलाएं, नाई, सब्जी और फल विक्रेता, समाचार पत्र विक्रेता, सफाई कर्मी, सिर पर मैला ढोने वाले, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, पशुपालक, बीड़ी बनाने वाले श्रमिक, ऑटो चालक, रेहड़ी-फड़ी चालक, दुकानों पर काम करने वाले श्रमिक असंगठित क्षेत्र में आते हैं। इसके अलावा छोटे और सीमांत किसान भी इसके तहत आते हैं।
बोर्ड के सदस्य काम करते तो श्रमिकों को मिलते ये लाभ
- आईडी कार्ड
- पीएफ की व्यवस्था
- चोट लगने पर मिलने वाले लाभ
- ईएसआई या स्वास्थ्य इंश्योरेंस
- पक्के छत की व्यवस्था
- बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा
- कौशल उन्नयन
- वृद्धाश्रम व पेंशन
- जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए अन्य योजनाएं
इन समस्याओं से जूझ रहे हैं असंगठित क्षेत्र के कामगार
- अस्थायी रोजगार
- सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता
- श्रम कानूनों के तहत नहीं आते
- स्वास्थ्य संबंधी खतरे बहुत अधिक
- खतरनाक उद्यमों में भी सुरक्षा नहीं
- बढ़ती हुई जटिल आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था
सरकार कहती है कि मजदूरों का शोषण न हो। इसके लिए सोशल सिक्योरिटी एक्ट बनाए जाते हैं, लेकिन राज्य सरकारें उन्हें लागू नहीं करती हैं। इससे मजदूरों का नुकसान होता है। चंडीगढ़ में पहले तो 10 साल बाद बोर्ड बनाया गया। बोर्ड बनने के बाद अब उसका कार्यकाल खत्म होने वाला है और आजतक उसकी कोई बैठक नहीं हुई। इससे बड़ा शोषण मजदूरों का और क्या हो सकता है। - जीवाराज, राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य, ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एक्टू)
बोर्ड के गठन के बाद बैठक होनी चाहिए थी। यह पता किया जाएगा कि ऐसा क्यों हुआ है। बोर्ड का कार्यकाल खत्म होने में अभी कुछ समय बाकी है, उसे समय से पहले ही आगे बढ़ा दिया जाएगा। - धर्मपाल, सलाहकार, यूटी प्रशासक