कथक: काशी के इस फन को आगे बढ़ा रहीं ये महिला कलाकार, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, यूएस के युवा आज भी ले रहे तालीम
बनारस की मधु मिश्रा, सरला नारायण सिंह और संगीता सिन्हा कई दशकों से कथक सीखा रही हैं। विदेशी युवा उनसे ऑनलाइन क्लास लेते ही हैं इसके साथ ही भारत के भी नन्हें कलाकार तालीम लेते इन महिलाओं के पास आते हैं। कथक को आगे बढ़ाना ही इनका मकसद है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
वर्ष 1951 में जन्मीं बनारस के नाटी इमली की रहने वाली मधु मिश्रा विख्यात कथक डांसर रही हैं। जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्वीट्जरलैंड सहित विभिन्न देशों में जाकर बनारस के इस फन को प्रसिद्धि दी है। मधु आज उन्हीं पैरों की गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं, जिनमें कभी घुंघरू सजा करते थे। दर्शकों की वाहवाही लूटते थे।
74 वर्षीय मधु एक सवाल के जवाब में कहती हैं कि जिस दिन कलाकार अपनी कला से संतुष्ट हो गया फिर वह कलाकार नहीं रहता। यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो जाती हैं।
उनकी बेटी अनिता तिवारी बताती हैं कि मां को विदेशों में काफी सम्मान मिले लेकिन वे अपने भारत में भी सम्मानित होना चाहती हैं। 1991 में मधु मिश्रा को संस्कृति मंत्रालय से फेलोशिप मिली थी। इसके बाद वे लगातार पद्मश्री के लिए प्रयासरत हैं। इन्होंने विदेशों में कई युवक-युवतियों को भी कथक की शिक्षा दी।
मधु मिश्रा बताती है कि उन्होंने जर्मनी में ज्यादा कार्यक्रम किए। तीन महीने की ट्रीप में लगभग 70 कार्यक्रम करने होते थे। स्वीट्जरलैंड के एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए वे बताती है कि यहां चैरिटेबल के तहत एक चर्च में कार्यक्रम करना था। घुंघरू पहनने के बाद कलाकार जुते या चप्पल नहीं पहनते। इसलिए मेरी टीम ड्रेसिंग रूम से मंच तक पैदल जाने लगे।
चारों तरफ बर्फ गिरी हुई थी। बर्फ में हमें नंगे पांव चलता देख वहां के लोग दंग रह गए। सब कह रहे थे- आह माय गॉड... हाउ इट्स पॉसिबल। वे लोग तुरंत कई चादर लेकर आए और हमारे रास्ते में बिछा दिया। कार्यक्रम के बाद हमारी टीम को काफी तारीफ मिली।
जयपुर और लखनऊ के साथ बनारस भी कथक का प्रमुख घराना रहा है। राजस्थान में जन्मे जानकी प्रसाद ने बनारस में ही अपने इस फन को पहचान दी। इस फन को जीवंत रखने में यहां की महिला कलाकारों का खास योगदान हैं। विदेशों के युवक-युवती आज भी बनारस घराने के कलाकारों से कथक का फन सीखने आते हैं।
बीएलडब्ल्यू में रहकर सरला नारायण सिंह भी इन दिनों विदेशी बच्चों को कथक सीखाती हैं। अपने गुरु पंडित चंद्रशेखर मिश्रा के बारे में वह बताती हैं वे कोई फीस नहीं लेते थे। उन्हें प्रतिदिन दूधवाली चाय गिलास भरकर चाहती थी। महज 4 साल की उम्र में ही उनका तन और मन डांस की ओर आकर्षित होने लगा।
मित्र के कहने पर पिताजी सरला को कथक सिखाने ले गए। गुरु चंद्रशेखर ने एक-दो-तीन-चार के स्टेप से शुरुआत की और धीरे-धीरे सरला ने इस तरीके पकड़ लिया।
द्राैपदी चीर हरण है सरला का पसंदीदा भाव
सरला अपनी उम्र के साथ कथक के फन को तराशती गईं। आज वे लगभग 60 साल की हो गई हैं फिर भी उसी जोश के साथ युवाओं को सीखाती हैं। सरला का पसंदीदा भाव द्रौपदी चीर हरण का है। इस नृत्य को देखने के लिए बिहार में 7 घंटे और बीएचयू (1979) में तकरीबन 5 घंटे तक उन्होंने दर्शकों को बांधकर रखा। इस पर उन्हें काफी सम्मान मिले। अलख नंदा ने उन्हें इस भाव को सिखाया था। सरला नारायण के पास स्पेन, इजराइल, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, कोरिया के युवा कथक सीखने आते हैं।
पंडित बिरजू महाराज कथक के भगवान हैं...
कथक नृत्यांगना संगीता सिन्हा लगभग 40 साल से बच्चों को यह फन सिखा रही हैं। यूएस, जर्मनी में के युवाओं ने उनसे कथक सीखा। आॅनलाइन क्लास के माध्यम लोग संगीता से जुड़ते हैं, रियाज करते हैं। संगीता सिन्हा 1982 में जाने-माने तबला वादक पंडित किशन महाराज से मिलीं। इसके बाद 1985 में उन्हीं के माध्यम से पंडित बिरजू महाराज से उनकी पहली मुलाकात हुई। उन्हें अपना गुरु मान लिया।
गुरुजी के एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि 1976 से मैं आपको फॉलो कर रही हूं। बिरजू महाराज ने भी संगीता सिन्हा में अपने जैसे भाव देखे थे। वे बताती हैं कि आज जितने भी डांसर कथक कर रहे हैं, वे मेरे पंडित बिरजू महाराज को ही कॉपी कर रहे हैं। इन कलाकारों में आंखों के भाव से लेकर पैरों की थाप... ये सब गुरुजी की ही देन हैं।
बनारस में पंडित बिरजू महाराज की एकमात्र शागिर्द संगीता सिन्हा ने गुरु-शिष्य की अडिग परंपरा को आज भी जीवंत रखा है। बनारस के इस फन को आगे बढ़ाने के लिए ही उन्होंने 1992 में राजेंद्र प्रसाद घाट पर हर साल कथक का आयोजन करवाती रहीं। महामारी कोरोना आने के बाद इस कार्यक्रम को विराम दे दिया गया। वे बताती हैं कि ऐसे आयोजनों से युवाओं का उत्साह भी बना रहता है।
प्रख्यात नृत्यांगना संगीता इन दिनों मुंबई में रहकर बच्चों को रहकर कथक सीखा रही हैं, लेकिन उन्होंने बनारस नहीं छोड़ा। आज भी उनसे सीखने के लिए नामचीन घरानों के बच्चे आते हैं। कथक की तालीम लेते हैं। अपने गुरु पंडित बिरजू महाराज की स्टाइल (पूड़ी... जलेबी... हलवा... की थाप) में बच्चों को कथक सीखा रही हैं।
संकटमोचन संगीत समारोह के बाबत वह बताती हैं कि ऐसे आयोजन होने चाहिए। इस बहाने लोग कला और उनके फन को देखते हैं। इसमें थोड़े बदलाव की जरूरत है। बनारस के कलाकारों को भी इसमें मौका मिलना चाहिए। इससे युवाओं का मनोबल बढ़ेगा।
एक कलाकार ही दूसरे कलाकार को मारता है
युवा कथक नर्तक आशीष सिंह ‘नृत्य मंजरी दास’ ने बहुत सख्त लहजे में बताया कि आज एक कलाकार दूसरे का दुश्मन बन जा रहा है। कथक बनारस की अनोखी कला रही है। खासतौर से महिला कलाकारों ने अपने समय में काफी संघर्ष किया, वह भी तब जब घूंघट प्रथा चरम पर थी।
आने वाली पीढ़ियों को इस संघर्ष को भूलना नहीं चाहिए। वरिष्ठ कलाकारों ने हमारे लिए ही संघर्ष किया ताकि हम कथक को जीवंत रख सकें। वर्तमान में कमी गुरु और शिष्य दोनों तरफ से है। कभी गुरु सख्त लहजा अपना रहे हैं तो कभी शिष्य ही नकारे साबित हो जाते हैं। इस मतभेद को खत्म करना होगा।
कथक के पूर्वजों ने जिस फन को चरम पर लाया आज वह पतन की ओर जा रहा है। इसे बचाने की जरूरत है। इसमें कुछ लोगों का साथ तो मिल रहा है लेकिन आवश्यकता है तो सिर्फ मजबूती की।