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Varanasi News: 2025 में पूरा होगा काम, तब तक गंगा में गिरता रहेगा सीवर का पानी; बन रही है ये कार्ययोजना

Sat, 20 Jul 2024 09:37 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 20 Jul 2024 09:37 AM IST
सार

Varanasi News: काशी के गंगा में गिर रहे नालों और सीवर के पानी को लेकर पहले से ही कई कार्ययोजनाओं पर काम हो रहा है। इन योजनाओं में और तेजी लाई जाएगी। इसके तहत 2025 के दिसंबर तक गंगा में सीवर का पानी गिरता रहेगा। इसके बाद काफी हद तक इसे रोक दिया जाएगा।

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Varanasi News Work completed in 2025 then sewer water will keep falling into Ganga action plan being made
पुराना पुल के नीचे से जा रहा सीवर का पानी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गंगा में नालों से गिर रहे सीवर को रोकने की योजना दिसंबर 2025 में पूरी होगी। तब तक गंगा में टेंपरेरी ट्रीटमेंट के जरिये नालों से पानी जाएगा। वर्तमान में 520 एमएलडी सीवर शहर से निकल रहा है। जबकि जल निगम के पास 7 एसटीपी के जरिये 420 एमएलडी सीवर शोधन की क्षमता है। वर्तमान में असि, नगवां और सूजाबाद के नालों के जरिये सीवर जा रहा है।

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जल निगम का दावा है कि गंगा में नालों के जरिये जो सीवर जा रहा है वह टेंपरेरी ट्रीटमेंट सिस्टम के जरिये जा रहा है। इसके अलावा पंपिंग स्टेशनों पर बाईपास के लिए बनी पाइपों से जो पानी गिर रहा है वह बारिश के समय गिरता है। जल निगम उसे नाले का सीवर नहीं बल्कि बारिश का पानी मानता है।
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शहर की सीवर व्यवस्था को मजबूत करने की कार्ययोजना कई सालों से चल रही है। जो अब तक पूरी नहीं हुई। शहर में 7 एसटीपी होने के बाद भी कई इलाकों से नाले का पानी सीधे गंगा नदी में गिर रहा है।
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टूट चुकी हैं पाइप लाइनें
जानकारों के अनुसार, कई जगहों पर चेंबर और पाइप लाइनें टूट चुकी हैं। जिसकी वजह से सीवर ओवरफ्लो होकर गंगा में जा रहा है। जल निगम के अनुसार गंगा नदी में गिरने वाले मलजल को रोकने के लिए भगवानपुर में 55 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहा है। 

नगवां व अस्सी से गिर रहे गंदे पानी पर लगाम लगाया जा रहा है। बायोरेमेडियेशन से नालों से गिरने वाले गंदे पानी को शोधित करने के बाद छोड़ा जाता है। इसके लिए जियोबैग लगाया गया है। जो फीकल कोलीफाॅर्म की संख्या को कम करता है। इससे सीधे गंगा में मलजल नहीं जा पाता है।

शोधन से पहले तकरीबन दो लाख एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) प्रति 100 मिलीलीटर फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया जियोबैग से शोधित हो रहा है। शोधन के बाद 230 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर फीकल कोलीफार्म आ रहा है। जियोबैग में खास केमिकल होता है। 

जियोबैग से शोधन के बाद गंगा में गिरने वाले सीवर का बीओडी स्तर काफी कम होता है। इससे गंगा के जलीय जंतुओं को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। शोधन से पहले 120 मिलीग्राम प्रति लीटर बीओडी शोधन के बाद 30 के आसपास होती है। खास तरह के प्लास्टिक के बने बैग में बैक्टीरिया और केमिकल होते हैं। इस बैग से सीवर को गुजारा जाता है। जो फिल्टर करने के बाद गंगा में जाता है।

बोले अधिकारी
दिसंबर 2025 तक गंगा में गिर रहे सीवर को रोकने के लिए एसटीपी का काम पूरा होगा। इसके बाद गंगा में सीवर नहीं जाएगा। वर्तमान में तीन नालों से गंगा में पानी जा रहा है। यहां टेंपरेरी ट्रीटमेंट सिस्टम लगाया गया है जो ट्रीटेड वाटर है। पंपिंग स्टेशनों से गंगा में गिरने वाला पानी बारिश का होता है। - आशीष कुमार सिंह, अधिशासी अभियंता, जल निगम।

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