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क्रिया योग के जनक श्यामाचरण की 125वीं पुण्यतिथि पर जारी होगा 125 रुपये का सिक्का

Thu, 15 Oct 2020 01:33 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 15 Oct 2020 01:33 AM IST
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varanasi dak ticket on 125 rs
क्रिया योग के जनक योग साधक श्यामाचरण लाहिड़ी की 125वीं पुण्यतिथि के अवसर पर वित्त मंत्रालय की ओर से 125 रुपये का सिक्का जारी किया जाएगा। यह क्रिया योग के साधकों के लिए संग्रहणीय और स्मारक के तौर पर होगा।
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योगीराज श्यामाचरण मिशन के संस्थापक सदस्य राजेश अय्यर और संयुक्त सचिव केयूर मजूमदार ने बताया कि भारत सरकार की ओर से 125 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया जा रहा है। अक्तूबर के अंत तक इसे जारी कर दिया जाएगा। मुख्य अतिथि और सिक्का जारी करने की तिथि पर अभी मंथन चल रहा है। उन्होंने बताया कि देश और दुनिया मे इन्हें ‘लाहिड़ी महाशय’ के नाम से भी जाना जाता है। 125 रुपये के सिक्के से पहले भी देश में पांच बार 125 रुपये के सिक्के जारी हो चुके है। भारतीय राजपत्र के अनुसार, 35 ग्राम वजन के इस सिक्के को बनाने में अन्य धातुओं के साथ 50 प्रतिशत चांदी का मिश्रण भी प्रयोग किया जाएगा। इसमें 40 फीसदी तांबा, पांच प्रतिशत निकिल और पांच प्रतिशत जस्ता शामिल है। यह 125 रुपये का सिक्का प्रचलन में नहीं आएगा, बल्कि यह संग्रहणीय वस्तु की तरह होगा।
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काशी से दिया दुनिया को योग का संदेश
श्यामाचरण लाहिड़ी ने दुनिया को योग के विविध आयाम और क्रियाओं से परिचित कराया। 18वीं शताब्दी के उच्च कोटि के साधक श्यामाचरण के योग की विशेषता यह थी कि गृहस्थ मनुष्य भी योगाभ्यास से शांति प्राप्त कर योग के उच्चतम शिखर पर पहुंच सकते थे। वह अपने अनुयायियों को उनकी प्रवृत्तियों के अनुसार भक्ति योग, कर्म योग, ज्ञान योग व राज योग के मार्ग पर चलने का संदेश देते थे। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि बंगाल के नदिया जिले में कृष्णनगर के निकट धरणी नामक गांव के ब्राह्माण परिवार में 30 सितंबर 1828 को जन्मे श्यामाचरण लाहिड़ी का पठन-पाठन काशी में हुआ। जंगमबाड़ी में रहने वाले श्यामाचरण जीविकोपार्जन के लिए छोटी उम्र में नौकरी में लग गए। वह दानापुर में मिलिट्री एकाउंट्स आफिस नियुक्त रहे। कुछ समय के लिए वे सरकारी काम से अल्मोड़ा के रानीखेत भेजे गए। इसी दौरान गुरु प्राप्ति व दीक्षा हुई। 1880 में पेंशन लेकर वह काशी आ गए और पुराने निवास स्थान में रहने लगे। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को योग के महत्व को समझाया। 26 सितंबर 1895 में उन्होंने देहत्याग किया।
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