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उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जयंती पर विशेष: बाबा विश्वनाथ की ओर खिड़की तो अब भी खुलती है लेकिन शहनाई नहीं गूंजती

Sun, 21 Mar 2021 04:24 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sun, 21 Mar 2021 04:24 PM IST
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Ustad Bismillah Khan birth anniversary Special: window open still front of Baba Vishwanath but shehnai not resonate
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां। - फोटो : अमर उजाला

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान हड़हा सराय में अपने मकान की सबसे ऊपरी मंजिल पर रहा करते थे। उनके कमरे की एक खिड़की काशी विश्वनाथ मंदिर की दिशा में खुला करती थी। जब तक उस्ताद जिंदा रहे बाबा भोलेनाथ को भोर में शहनाई बजाकर जगाया करते थे। खिड़की तो अब भी खुलती है, लेकिन बिस्मिल्लाह की शहनाई नहीं गूंजती।

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भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। पं. पूरण महाराज ने बताया कि खान साहब कहते थे कि संगीत के बहुत से अंग हैं उनसे बनने वाली रागिनियां भी ढेर सारी हैं। संगीत अपने आप में संपूर्ण जीवन है। वह बचपन से ही काशी की गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल थे। उनका रियाज गंगा किनारे बालाजी मंदिर की चौखट पर होता था। धर्म की सीमाओं से परे मां सरस्वती के अनन्य भक्त थे। वह अक्सर मंदिरों में शहनाई बजाया करते थे। शहनाई उनके लिए अल्लाह की इबादत और सरस्वती वंदना का जरिया थी। संगीत के माध्यम से उन्होंने एकता, शांति और प्रेम का संदेश दिया था।
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उस्ताद की दत्तक पुत्री पद्मश्री डॉ. सोमा घोष का कहना है कि बाबा की शहनाई बनारस का हिस्सा है। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए। इसी का असर था कि बनारस का रस उनकी शहनाई से टपकता था। बिस्मिल्लाह खान ने अपने लिए वह मुकाम बनाया है कि जब-जब शहनाई का नाम लिया जाता है उनका नाम सबसे पहले आता है। एक तरह से शहनाई और बिस्मिल्लाह एक दूसरे के पर्याय हैं।

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बिस्मिला खान की शहनाई वादन बन गई थी प्रथा
भारत की आजादी और बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का भी खास रिश्ता रहा है। 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराया गया तो उनकी शहनाई ने भी वहां आजादी का संदेश बांटा था। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्ला का शहनाई वादन एक प्रथा बन गई।

दुनिया भर में बिखेरा शहनाई का जादू
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जादू देश और दुनिया के संगीतप्रेमियों के सिर चढ़कर बोला। अपने जीवन काल में उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस में अपनी शहनाई की जादुई धुनें बिखेरीं। उन्होंने गूंज उठी शहनाई, सत्यजीत रे की फिल्म जलसाघर में संगीत दिया। अखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिंदी फिल्म स्वदेश में शहनाई का जादू चलाया।

पैदल पहुंच गए थे शहनाई बजाने
पद्मविभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र ने बताया कि बिस्मिल्लाह खान के जाने के साथ ही हमारा शहर बूढ़ा हो गया। वह अपने लिए नहीं श्रोताओं के लिए शहनाई बजाया करते थे। राय कृष्ण दास के बागीचे में रामचरित मानस का पाठ रखा गया था। पं. बैजनाथ ने उस्ताद से कहा कि अंतिम दिन शहनाई बजा देता त मजा आ जात...। बिस्मिल्लाह ने कहा बिल्कुल आएंगे। बैजनाथ ने कहा कि गाड़ी भेज दें तो बिस्मिल्लाह का जवाब था भगवान के काम में कैसी गाड़ी फिर समापन के दिन हड़हा सराय से पैदल ही चार किलोमीटर दूर बागीचे में पहुंच गए। तबले पर संगत के लिए पं. किशन महाराज थे। ऐन मौके पर बिस्मिल्ला कहते हैं हमारी तबीयत ठीक नहीं लग रही, किशन महाराज भी खुद की तबियत खराब होने की बात कहने लगते हैं। चिंतित पं. बैजनाथ कहते हैं यार आप लोग बजाएंगे नहीं तो बड़ी बेइज्जती हो जाएगी। बिस्मिल्लाह ने कहा कि तबियत ठीक हो सकती है पर इसके लिए जरूरी है आप सारंगी बजाइए। बैजनाथ ने उनकी बात मान ली और उसके बाद रातभर जो समा बंधा वो हर किसी को आज भी याद है।

वो मंजर हमें यहां कहां से मिलेगा
शिया जामा मस्जिद के हाजी फरमान हैदर ने बताया कि एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने अमेरिका में बस जाने का न्योता दिया। 1955 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनकी शहनाई सुनी तो उन्हें लंच पर आमंत्रित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पूछा आपके घर में कितने लोग हैं। उस्ताद ने कहा कि 54 लोग। राष्ट्रपति ने कहा कि खाने पर कितना खर्च आता है। उस्ताद ने पूछा कि यह क्यों पूछ रहे हैं तो राष्ट्रपति ने कहा कि जितना भी खर्च आता है उसका दोगुना देंगे। तनख्वाह देंगे। घर देंगे अमेरिका बस जाओ। बिस्मिल्लाह ने जवाब दिया साहेब बस तो जाएं लेकिन सुबह-सुबह जब हम घर से निकलते हैं और दोनों तरफ लोग खड़े होकर आदाब-आदाब करते हैं वो मंजर हमें यहां कहां से मिलेगा।

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