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अग्निपथ पर आगे बढ़ रहा आधी आबादी का कीर्तिरथ

Thu, 03 Mar 2022 12:10 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 03 Mar 2022 12:10 AM IST
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The fame of half the population is progressing on Agneepath
वाराणसी। मेहनत पर भरोसा कर सफलता हासिल करने का ये जज्बा उन महिलाओं में हैं, जिन्हें समाज अबला, बेचारी और कमजोर कहता रहा है। बदलते वक्त में महिलाओं का कद और पद दोनों ही बदले हैं। परिवार संभालने के परंपरागत दायित्व को बखूबी निभाते हुए महिलाएं आज दूसरों का जीवन भी संवारने में जुटी हैं। हालातों ने कदम-कदम पर इन महिलाओं का रास्ता रोका, लेकिन कुछ कर गुजरने की चाह में हालात हौसलों के आगे दम तोड़ गए। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को है, ऐसे में हफ्ते भर हम कुछ ऐसी ही महिलाओं की कहानी से रूबरू होंगे।
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हिजाब में हुनर को परवाज
अपने हुनर के जरिये खुद को साबित करने और आत्मनिर्भर बनने की ललक उनमें भी खूब है। कोई अपने सिलाई के हुनर के बूते आगे बढ़ रही हैं, तो कोई घर की सजावट में रंग भर रही हैं। फैशन डिजाइनिंग से लेकर ज्वेलरी डिजाइनिंग पेंटिंग, क्राफ्ट, सिलाई-कढ़ाई के हुनर के जरिये अपने पंखों को उड़ान देने में जुटी हैं। इनमें उनका मददगार बना है ‘वी द वुमेन’। साल 2015 में पहली बार घनी मुस्लिम आबादी रेवड़ी तालाब के अशफाकनगर की गजाला परवीन ने ‘वी द वुमेन’ की शुरुआत की। गजाला परवीन कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं में हुनर है लेकिन उन्हें मंच नहीं मिला। इसी मकसद से मैंने संस्था की शुरुआत की, महिलाओं को इससे जोड़ा। ‘हुनर भी चाहे नया नजारिया’ की थीम पर जिन्हें जो कुछ आता था, उन्हें मंच दिया। गजाला बताती है जब मैंने इस मुहिम की शुरुआत की तो पहले दिन सिर्फ चार आए थे, धीरे-धीरे दायरा बड़ा अब ये महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर अपने पैरों पर खड़ी हैं। अब तक इससे पांच हजार महिलाएं जुड़ चुकी है।
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बच्चों के जीवन में शिक्षा और संस्कार गढ़ रही वैदेही
मंजिलें बड़ी जिद्दी होती हैं, हासिल कहां नसीब से होती हैं, मगर वहां तूफान भी हार जाते हैं, जहां कश्तियां जिद पर होती हैं...। ये पंक्तियां गरीब बच्चों की जिंदगी संवार रही नटिनियादाई निवासी वैदेही पर सटीक बैठती हैं। कभी अपने युवावस्था में उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना देखा था, लेकिन लड़के, लड़कियां एक साथ पढ़ने के कारण परिवार वालों ने इनकार कर दिया। शादी हुई तो फिर अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में लग गई, लेकिन परिवार और बच्चों को एहमियत देते हुए उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने घर की जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद जरूरतमंदों के चेहरे पर खुशी लाने का बीड़ा उठाया। 66 वर्षीय वैदेही आज समाज के ऐसे बच्चों को शिक्षा और संस्कार का बीज बो रही हैं, जिन्हें उनके घर और परिवार में मौका नहीं मिल पाता। इन बच्चों की जरूरतें वैदेही पूरी करती हैं। वैदेही के प्रयास का ही नतीजा है, जो आज कई बच्चों को स्कूलों का दाखिला भी मिल चुका है।
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