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देश को तोड़ने वाली विचारधारा से रहें सावधान

Mon, 09 Nov 2015 01:43 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 09 Nov 2015 01:43 AM IST
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The country with the ideology which remain careful chipped

सहिष्णुता और परस्पर सहयोग के बिना सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है। विभिन्न धर्मों, पंथों, संस्कृतियों और सामाजिक अवधारणाओं वाले इस देश में सबकी मान्यताएं और परंपराएं अपनी-अपनी हैं।

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ऐसे में सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति के बिना भला नहीं हो सकता। ये बातें अंधरापुल स्थित सिटी गार्डेन में रविवार को सर सैय्यद सोसाइटी की ओर से आयोजित साझा भारतीय संस्कृति और वर्तमान राजनीति विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही गईं।
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सर सैय्यद डे पर संगोष्ठी का आगाज मोहसिन उस्मानी की तिलावत से हुआ। बतौर मुख्य अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति डॉ. पृथ्वीश नाग ने कहा कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राचीन संस्कृति का हिस्सा रही है।
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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन्हीं मूल्यों पर संविधान की रचना की गई, ताकि शांति- सद्भाव की स्थापना के साथ ही राष्ट्र का सर्वांगीण विकास हो सके।
 ऐसे में जरूरी है कि हमारी मौजूदा राजनीति भी उन्हीं आदर्शों, मूल्यों के अनुरूप हो। ऐसा न होने से सर्वधर्म समभाव की अवधारणा प्रभावित हो सकती है।
 सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि कुछ राष्ट्र विरोधी तत्व अपनी संकुचित और संकीर्ण विचारधारा समाज पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं।
 इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। संकीर्ण विचारधारा देश की एकता, अखंडता के लिए बड़ी चुनौती है। इस चुनौती से लड़ने के लिए आमजन के साथ बुद्धिजीवियों को भी आगे आना होगा।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. शकील समदानी ने देश के मुसलमानों को शिक्षा की मुख्य धारा में लाने के सर सैयद के प्रयासों को रेखांकित किया।
 उन्होंने कहा कि सर सैय्यद ने भांप लिया था कि आने वाले दिनों में तकनीकी शिक्षा के बिना देश में मुसलमानों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
अध्यक्षता कर रहे मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा कि अभिव्यक्ति का अधिकार और सहिष्णुता भारत के मूल में निहित है।
ऐसे में गंगा जमुनी तहजीब को बरकरार रखने के लिए लोगों को आगे आना चाहिए। बीएचयू के प्रो. आरके शुक्ला, प्रो. आफताब अहमद आफाकी, खालिद अहमद ने भी विचार व्यक्त किए।
 खलीकुज्जमा ने अतिथियों का स्वागत किया। हाजी इश्तियाक अहमद ने संस्था की वार्षिक रिपोर्ट पेश की। संचालन इशरत उस्मानी ने किया।

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