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आम बगानों पर चिमनियों की ‘काली छाया’

Tue, 26 Apr 2016 02:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 26 Apr 2016 02:06 AM IST
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आधुनिकता और शहरीकरण से आम के बागों का रकबा पहले की तुलना में करीब चार गुना घट गया है। अब जो आम के बगीचे बचे भी हैं तो उन्हें ईट भट्ठों की ‘काली छाया’ बर्बाद कर रही है। प्रदूषण नियंत्रण के निर्धारित मानकों की अनदेखी कर संचालित हो रहे 150 से अधिक ईट भट्ठों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं आम की उपज के लिए घातक बन गया है। पेड़ बर्बाद हो रहे हैं और फल भी। उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आने के साथ ही फलों की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है। हालात इतने गंभीर हैं कि पांच सालों में आम के उत्पादन में करीब पांच सौ मीट्रिक टन की कमी आई है।
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जिले के सेवापुरी, चिरईगांव, चोलापुर, आराजीलाइन, पिंडरा में आम की फसल को काफी नुकसान पहुंच रहा है। जिले में लगभग 350 ईंट भट्ठे हैं,  जिनमें 250 भट्ठे संचालित हैं। जानकारों की मानें तो 100 भट्ठों में तो नए नियम के अनुसार प्रदूषणमुक्त चिमनियां बना दी गई है। लेकिन अभी 150 ईंट भट्ठे पुरानी चिमनी पर ही चल रहे हैं। इनसे निकलने वाले धुएं से आम की फसल को नुकसान पहुंच रहा है। सूत्रों का कहना है कि ऐसे भट्ठों के खिलाफ शासन-प्रशासन स्तर से कोई कार्रवाई नहीं हो रही। सरकार और जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते आम की फसल को नुकसान पहुंच रहा है। बाग मालिकों का कहना है कि ऐसे ईंट भट्ठों पर जल्द अंकुश नहीं लगाया गया तो आम की जो फसल बची है वह भी नष्ट हो जाएगी। जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि आम का उत्पादन घटकर 12 हजार मीट्रिक टन रह गया है।
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