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मानव विकास के सशक्त हस्ताक्षर उपेक्षा के शिकार
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 18 Apr 2016 12:52 AM IST
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दुनिया की प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक नगरी काशी में धरोहरों की अपनी चमक है। तंग गलियों में शहर का दिल बसता है तो गंगा घाटों पर हर वक्त जिंदगी थिरकती है। यह हर कदम पर रचे-बसे बनारसी ठाठ की पूरी दुनिया दीवानी है। न जाने कितनी सदियों के इतिहास को अपने कलेजे से चिपकाए इन घाटों के आसपास अतीत की स्मृतियाें के कई खूबसूरत अहसास अपने उसी जीवंत स्वरूप में आज भी विद्यमान हैं। देखिए तो बस देखते रह जाइए। घाटों से शुरू होने वाला काशी की धरोहरों का सफर भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ में और भी खूबसूरत बन जाता है। मगर अफसोस यह कि इन धरोहरों के काशी के पर्यटन और यहां की सांस्कृतिक चेतना का आधार होने के बावजूद अब तक इनके संरक्षण और वहां जरूरी बुनियादी सुविधाओं के विकास का खाका नहीं खींचा जा सका है। धरोहरों के संरक्षण की जो योजनाएं घोषित हुई हैं वे भी अब तक परवान नहीं चढ़ पाई हैं। सरकारी मशीनरी की बेपरवाही के साथ आम जनता की उदासीनता भी धरोहरों पर भारी पड़ने लगी हैं और कुछ का तो वजूद ही खतरे में पड़ गया है।
सैकड़ों वर्ष पूर्व से अब तक कीमानव संस्कृति और सभ्यता में आए आमूल चूल परिवर्तन और विकास के जीवित सुबूत पुरातात्विक धरोहर जनता और सरकार दोनों से उपेक्षित हैं। सारनाथ के पुरातात्विक धरोहरों की बात करें तो यहां दोहरी मुश्किलें हैं। एक तो एएसआई (भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण) की ओर से धरोहरों के संरक्षण के लिए पर्याप्त प्रबंध नहीं किए जा रहे हैं दूसरी तरफ आस्था के नाम पर धरोहरों के वजूद से खिलवाड़ चल रहा है। हालात ऐसे हैं कि जल्द इस ओर ध्यान न दिया गया तो आने वाले समय में यहां की कुछ ऐतिहासिक धरोहरें गुजरे जमाने की बात बन जाएंगी।
सारनाथ का चौखंडी स्तूप हो या खंडहर परिसर (इसी में मूल गंध कुटी विहार और धमेख स्तूप है) इनकी सुरक्षा का कोई ठोस प्रबंध नहीं है। यहां जब तब लोग इधर-उधर टहलते और फोटोग्राफी करते नजर आते हैं। जिस चौखंडी स्तूप की बौद्ध मतावलंबी पूजा-अर्चना करते हैं, उसकी दीवारों के संरक्षण का कोई प्रबंध नहीं है। तमाम लोग इन दीवारों पर चढ़कर बाकायदा टहलते देखे जाते हैं। देखरेख न होने से दीवारें कमजोर होती जा रही हैं। इसी तरह, धर्मराजिका स्तूप में आस्था के नाम पर धातुओं के छोटे-छोटे पत्तर मनाही के बावजूद लगाए जाते हैं। इससे स्तूप की दीवारों में क्षरण हो रहा है। यहां बड़ी-बड़ी मोमबत्तियां जलाने से दीवारें काली पड़ती जा रही हैं।
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विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं से चौखंडी स्तूप की पवित्र मिट्टी की खुलेआम सौदेबाजी की जाती है। इस अवैध खनन से भी दीवारों को भारी नुकसान हो रहा है। वहीं खंडहर परिसर में कहीं कोई निगरानी नहीं होती। लोग प्राचीन दीवारों, खंभों पर चहलकदमी करते रहते हैं।
कुछ स्वार्थीतत्वों द्वारा धमेख स्तूप पर श्रद्धालुओं को आस्था के नाम पर झांसा दिया जाता है। खाता भेंट करने वाले श्रद्धालुओं को बताया जाता है कि उनका खाता स्तूप पर जितना ऊपर जाकर रुकेगा, उतना ही अधिक पुण्य मिलेगा। इसके लिए श्रद्धालओं के खाते में कंकड़ बांधकर वे स्तूप पर फेंकते हैं। बार-बार कंकड़ फेंके जाने से स्तूप की दीवारों को नुकसान पहुंच रहा है।
यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में सारनाथ को शामिल कराने के प्रयास चल रहे हैं। अगर ऐसा हो जाता है तो यहां न केवल पर्यटन बढ़ेगा बल्कि धरोहरों के संरक्षण और विकास में भी मदद मिलेगी।
विश्व प्रसिद्ध सारनाथ स्थित खंडहर परिसर में इतिहास के पन्ने धुंधले हो रहे हैं। परिसर में पुरातात्विक खुदाई से निकले कई गुप्त कालीन अवशेष खुले में पड़े हैं। जाड़ा, गर्मी, बरसात के थपेड़ों से उनकी चमक फीकी पड़ रही है और उनमें क्षरण हो रहा है।
19वीं सदी की शुरुआत में सारनाथ में खुदाई हुई थी, जिसमें ये गुप्त कालीन अवशेष निकले थे। उस दौरान धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ जैसी कई महत्वपूर्ण धरोहरें भी निकलीं। प्रमुख धरोहरों को तो संरक्षित कर लिया गया लेकिन गुप्त कालीन कई अन्य महत्वपूर्ण अवशेष आज भी खंडहर परिसर में धूल फांक रहे हैं। इसकी वजह से इनमें क्षरण पैदा हो रहा है। जबकि पुरातात्विक वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए शेड भी बने हुए हैं, उसके बावजूद इन्हें खुले में छोड़ दिया गया है। इतिहास प्रेमी पुरातात्विक अवशेषों की अनदेखी से आहत हैं। वहीं भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण के अधिकारियों की यह बदहाली जाने क्यों नजर नहीं आती।
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सैकड़ों वर्ष पूर्व से अब तक कीमानव संस्कृति और सभ्यता में आए आमूल चूल परिवर्तन और विकास के जीवित सुबूत पुरातात्विक धरोहर जनता और सरकार दोनों से उपेक्षित हैं। सारनाथ के पुरातात्विक धरोहरों की बात करें तो यहां दोहरी मुश्किलें हैं। एक तो एएसआई (भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण) की ओर से धरोहरों के संरक्षण के लिए पर्याप्त प्रबंध नहीं किए जा रहे हैं दूसरी तरफ आस्था के नाम पर धरोहरों के वजूद से खिलवाड़ चल रहा है। हालात ऐसे हैं कि जल्द इस ओर ध्यान न दिया गया तो आने वाले समय में यहां की कुछ ऐतिहासिक धरोहरें गुजरे जमाने की बात बन जाएंगी।
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सारनाथ का चौखंडी स्तूप हो या खंडहर परिसर (इसी में मूल गंध कुटी विहार और धमेख स्तूप है) इनकी सुरक्षा का कोई ठोस प्रबंध नहीं है। यहां जब तब लोग इधर-उधर टहलते और फोटोग्राफी करते नजर आते हैं। जिस चौखंडी स्तूप की बौद्ध मतावलंबी पूजा-अर्चना करते हैं, उसकी दीवारों के संरक्षण का कोई प्रबंध नहीं है। तमाम लोग इन दीवारों पर चढ़कर बाकायदा टहलते देखे जाते हैं। देखरेख न होने से दीवारें कमजोर होती जा रही हैं। इसी तरह, धर्मराजिका स्तूप में आस्था के नाम पर धातुओं के छोटे-छोटे पत्तर मनाही के बावजूद लगाए जाते हैं। इससे स्तूप की दीवारों में क्षरण हो रहा है। यहां बड़ी-बड़ी मोमबत्तियां जलाने से दीवारें काली पड़ती जा रही हैं।
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विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं से चौखंडी स्तूप की पवित्र मिट्टी की खुलेआम सौदेबाजी की जाती है। इस अवैध खनन से भी दीवारों को भारी नुकसान हो रहा है। वहीं खंडहर परिसर में कहीं कोई निगरानी नहीं होती। लोग प्राचीन दीवारों, खंभों पर चहलकदमी करते रहते हैं।
कुछ स्वार्थीतत्वों द्वारा धमेख स्तूप पर श्रद्धालुओं को आस्था के नाम पर झांसा दिया जाता है। खाता भेंट करने वाले श्रद्धालुओं को बताया जाता है कि उनका खाता स्तूप पर जितना ऊपर जाकर रुकेगा, उतना ही अधिक पुण्य मिलेगा। इसके लिए श्रद्धालओं के खाते में कंकड़ बांधकर वे स्तूप पर फेंकते हैं। बार-बार कंकड़ फेंके जाने से स्तूप की दीवारों को नुकसान पहुंच रहा है।
यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में सारनाथ को शामिल कराने के प्रयास चल रहे हैं। अगर ऐसा हो जाता है तो यहां न केवल पर्यटन बढ़ेगा बल्कि धरोहरों के संरक्षण और विकास में भी मदद मिलेगी।
विश्व प्रसिद्ध सारनाथ स्थित खंडहर परिसर में इतिहास के पन्ने धुंधले हो रहे हैं। परिसर में पुरातात्विक खुदाई से निकले कई गुप्त कालीन अवशेष खुले में पड़े हैं। जाड़ा, गर्मी, बरसात के थपेड़ों से उनकी चमक फीकी पड़ रही है और उनमें क्षरण हो रहा है।
19वीं सदी की शुरुआत में सारनाथ में खुदाई हुई थी, जिसमें ये गुप्त कालीन अवशेष निकले थे। उस दौरान धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ जैसी कई महत्वपूर्ण धरोहरें भी निकलीं। प्रमुख धरोहरों को तो संरक्षित कर लिया गया लेकिन गुप्त कालीन कई अन्य महत्वपूर्ण अवशेष आज भी खंडहर परिसर में धूल फांक रहे हैं। इसकी वजह से इनमें क्षरण पैदा हो रहा है। जबकि पुरातात्विक वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए शेड भी बने हुए हैं, उसके बावजूद इन्हें खुले में छोड़ दिया गया है। इतिहास प्रेमी पुरातात्विक अवशेषों की अनदेखी से आहत हैं। वहीं भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण के अधिकारियों की यह बदहाली जाने क्यों नजर नहीं आती।