संकटमोचन संगीत समारोह: जिसको जो कहना हो कहता रहे...महंत विश्वंभर नाथ बोले- मैं कलाकार के बीच नहीं आ सकता
संकटमोचन संगीत समारोह की नादयात्रा का प्रवाह चौथी निशा से जुड़कर आगे बढ़ा। संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि सब लोग आते हैं हनुमान जी महाराज को सुनाने। जिनके पास जो विद्या वो वह सुनाएगा। मैं कलाकार के बीच नहीं आ सकता।
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संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि आज यह मंच वैश्विक स्वरूप ले चुका है। हम लोग किसी भी राज्य को छोड़ेंगे नहीं। सबको इस मंच पर लेकर आएंगे। जिसको जो कहना हो कहता रहे। हनुमानजी सर्वव्यापी हैं। हम तो पैर दबा दबाकर उनको रोके रहते हैं। लेकिन वह कहां नहीं विचरण करते रहते हैं। उनको भी सब सुनने का मन करता है।
मध्य रात्रि में आयोजन के दौरान मंच से प्रो. मिश्र ने कहा कि सब लोग आते हैं हनुमान जी महाराज को सुनाने। जिनके पास जो विद्या वो वह सुनाएगा। मैं कलाकार के बीच नहीं आ सकता। जनता जनार्दन के बीच किस रूप में हनुमान जी बैठे हों, हम नहीं जानते हैं। हम लोग ऐसी जगह पर ऐसा आयोजन कर रहे हैं जो हनुमान जी के निमित्त है। दुनिया बहुत कुछ कहती है।
कहने-सुनने में पड़ेंगे तो कुछ कर नहीं पाएंगे जीवन में। संगीत भगवत कृपा से किसी के घर में आता है और अगर आ गया है तो उसको जाने नहीं देना चाहिए। आजकल लोग छोटी-छोटी विद्या से लोगों को गुमराह करते हैं। गुमराह होने की जरूरत नहीं है। उसकी काट हनुमान जी हैं। बल-बुद्धि के दाता हैं। बल होगा तो बुद्धि नहीं देंगे, बुद्धि होगी तो बल नहीं देंगे। दोनों के समन्वय के लिए हनुमान जी की आराधना जरूरी है।
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महाबली का संगीत के फूलों से हुआ भव्य श्रृंगार
संकटमोचन संगीत समारोह की नादयात्रा का प्रवाह चौथी निशा से जुड़कर आगे बढ़ा। नादब्रह्म की उपासना के महोत्सव में कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को आनंदित किया। बजरंगबली के दरबार में गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से कलाकारों ने हाजिरी लगाई। भरतनाट्यम से हुआ श्रीगणेश मध्यरात्रि में सितार वादन तक पहुंचा। गुरुवार को शताब्दी वर्ष के आयोजन की चौथी निशा की शुरुआत दिल्ली से आईं रमा वैद्यनाथन ने गणपति की आराधना वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ:, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा...पर नृत्य से की। भरतनाट्यम की लयकारियों से हनुमत दरबार में श्रद्धा के पुष्प अर्पित किए।
तत्कार की संवादिनी पर रमा ने सुधा गीतों के साथ कदमों के सुंदर संयोजन से भावों की माला को विस्तार दिया। इसके बाद भजमन रामचरण सुखदाई, जिन चरणन से निकली सुरसरि शंकर जटा समाई... पर भरतनाट्यम की भक्तिपूर्ण भंगिमाओं ने दर्शकों को हनुमान भक्ति का साक्षात अहसास कराया।