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सावन की रिमझिम फुहारों में भीगे बिना नहीं मिलता है चैन: संजना रॉय

Tue, 25 Jul 2017 04:36 PM IST
amarujala.com, written by अनूप ओझा
amarujala.com, written by अनूप ओझा Updated Tue, 25 Jul 2017 04:36 PM IST
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sanjana roy chakrwarti talks about month of music sawan
ठुमरी गायिका संजना रॉय चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला
महाकवि कालिदास ने लिखा है- मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्यथावृत्तिचेत:। यानी पावस ऋतु के मेघ जीवन में सुख-संपन्नता लेकर आते हैं। सावन में कजरी तो खास है ही, बारिश की बूंदे पिया के न होने पर चुभती हैं। बेचैन कर देती है। महिलाओं के लिए यह बहुत रोमांटिक महीना है। राग तिलक कामोद में-भीगी जाऊं पिया मैं बचाय लैहो झरन लागी बूंदरिया । इस बंदिश में सावन के शृंगार के भाव प्रेम रस से भरे मिलते हैं। नायिका तो खुद भी घर जा सकती है लेकिन वह प्रेम के वशीभूत होकर पिया से गुहार लगाती है कि तुम आओ में भीग रही हूं, बचा लो...। बर्षा ऋतु के भावों पर यह कहना है बनारस घराने की ठुमरी गायिका संजना रॉय चक्रवर्ती का। वो कहती हैं..
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भीगी जाऊं पिया मैं बचाय लैहो झरन लागी बूंदरिया

सावन का जिक्र आते ही संजना के जेहन में पांच साल पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं, जब कोलकाता में ठुमरी के एक  प्रोग्राम में उन्हें जाना था और सावन झूम कर बरसने लगा। चारो ओर घटाएं छाने से अंधेरा सा छा गया था। सबकुछ पानी पानी हो गया था।
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आयोजक मौसम की अंगड़ाई से परेशान थे लेकिन उन्हीं घटाओं से लड़कर मैंने रास्ता निकाला था। वह बताती हैं कि वह क्षण बहुत सुखद होता है जब कारे बादल छाने लग जाते हैं। वह राग मेघ की बंदिश सुनाती हैं-बादर रे उमड़ि घुमड़ि घन बरसन लागे बिजुरी चमकि जिया डेरात...। वह कहती हैं कि बदरी जब-जब छाती है, संयोग वश पिया परदेस ही छाए रहते हैं।
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गीतों में कहा गया है-ऐसे समय सखि छाई बदरिया/ मोहे श्याम बुलावे केहू सखि जाओ लाओ मनहर को...। संजना राग पीलू में ठुमरी अंग की बंदिश पर सुरों की खनक पेश करती हैं- मग बिच करे बरजोरी राम श्याम सलोने सांवरिया... औचक आए धाए बहिंया धरि/सिर की गगरिया फोरी/दै तारी मुस्कात सजीले एक न मानत मोरी.../ श्याम सलोने सांवरिया...। ताल फिरता में वह कजरी की बंदिश के जरिए सावनी घटाओं की छटा को व्यक्त करती हैं।

अंखिया भईं घटा बरसाती/जब से पिया परदेस सिधारे बरसत है दिन राती.../ काजर रेख मनौ घनकारे भृकुटि बंख धनुष अनुहारे...झपकत पलक पतरि दिख बिच जिनु दामिनी बरसाती.../ लेत उसास मनौ घन घहरे अंसुअन बूंद मेह जिनु छहरे... बिरही अंधेरी में मोरी आली.. कहुं नहिं डगर लखाती... मन पुरवइया पवन सो डोले... पिया पिया पपीहा जिऊं बोली बोले....।

वह दादरा की बंदिश से सावन की फिजा में और खुशबू घोल देती हैं-ओ झमाझम पानी भरे री... कौने अलबेली किनार/हाथ लजुरिया सिर पे गगरिया/ तिरखी चितवन से मोहे घायल करे री...। संजना कहती हैं कि सावन में मिर्जापुरी और बनारसी कजरी की बात ही कुछ और है।

कजरी में जितना विरह, शृंगार का खजाना भरा है किसी दूसरी शैली में नहीं मिलता।  हमके सावन में झुलनी गढ़ाय दा पिया/जिया बहलाय दा पिया.../आई सावन की बहार/ लागे मेलवा बजार/अपने संग मोहे मेलवा घुमाय दा पिया... रहे सोने की झुलनियां/ ओमे हीरा की बिजुुरिया/ओमे मोतिया के पतिया लगाय दा पिया... जिया बहलाय दा पिया ना...। 

संजना रॉय चक्रवर्ती का प्रोफाइल
जन्मः 22 नवंबर 1985 
घराना: बनारस
गुरु: पूर्णिमा चौधरी
गायन: ख्याल, ठुमरी, टप्पा, पूर्वी, दादरा, होरी, चैती, कजरी, झूला। 
 
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