Varanasi: राज्यपाल आनंदीबेन पटेल बोलीं, बच्चों के लिए बनाएं संस्कृत के 50 वाक्य, इन्हें घर- घर मैं पहुंचाऊंगी
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 42वें दीक्षांत में पहली बार आठ छात्राओं को 23 स्वर्ण पदक मिले। यह पहला मौका था जब सबसे अधिक मेडल भी आचार्य की छात्रा टुंपा राय को दिया गया।
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 42वें दीक्षांत समारोह में 31 मेधावियों को 56 पदक दिए गए। इसमें 54 स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक भी रहा। 23 छात्र और आठ छात्राएं इसमें शामिल रहे। पिछले साल 41वें दीक्षांत समारोह में 30 मेधावियों को 59 पदक दिए गए थे। इसमें 57 स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक था। इसके अलावा 14 हजार 167 उपाधिधारकों की डिग्री दी गई थी वहीं इस बाद 13,733 डिग्रियां डिजीलॉकर में अपलोड हुई हैं।
बृहस्पतिवार सुबह 10 बजे शिष्ट यात्रा शुरू हुई। राज्यपाल और कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल ने ऐतिहासिक मुख्य भवन में दक्षिणी द्वार से प्रवेश किया। दीक्षांत परिधान गले में डालकर राज्यपाल और दीक्षांत समारोह की शिष्ट यात्रा मंच तक पहुंची। राष्ट्रगान के साथ समारोह की शुरुआत हुई। प्रारंभ पौराणिक और वैदिक मंगलाचरण भी गूंजे। कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के अनुरोध पर कुलाधिपति ने समारोह आरंभ करने की घोषणा की। 17 विभागों के विभागाध्यक्षों ने एक-एक कर मेडल व उपाधि पाने वाले मेधावियों को कुलपति, कुलाधिपति व मुख्य अतिथि के सामने प्रस्तुत किया।
कुलपति और अन्य अतिथियों का पुष्प और अंगवस्त्र के साथ स्वागत किया। धन्यवाद कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने किया। संचालन डॉ. मधुसूदन मिश्र ने किया। इस दौरान आयुष राज्यमंत्री दयाशंकर मिश्र दयालु, मेयर अशोक कुमार तिवारी, विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी, रमेश जायसवाल, प्रो. प्रेमनारायण सिंह, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, प्रो. हीरककांत चक्रवर्ती, प्रो. अमित कुमार शुक्ल उपस्थित थे।
दीक्षांत समारोह के दौरान सात मेधावी अनुपस्थित रहे। इसमें पांच स्वर्ण पदक पाने वाले हर्ष पांडेय, नागेंद्र द्विवेदी, रामप्रसाद भंडारी, धर्मजय भगत, अंकित शर्मा, अंकिता गौड़ और कृति पांडेय नहीं पहुंच सके थे। इन्हें बाद में मेडल दिया जाएगा।
पांच गांव के छात्र व प्रधानाध्यापक सम्मानित
राज्यपाल ने गोद लिए गए पांच गांव के विद्यालयों के विजेताओं और प्रधानाध्यापकों को भी किया। विद्यालयों में निबंध, चित्रकला, कहानी लेखन और कथा वाचन के विजेता मोनू राजभर, समीर, निष्ठा सेठ, नीरज गौतम, श्रेया शुक्ला, तीर्थ गौतम, श्रेयांस,आकांक्षा और अराधना को पुरस्कृत किया गया। प्रधानाचार्यों को भी कुलाधिपति ने उपहार और स्मृति चिह्न दिया।
आंगनबाड़ी केंद्रों को दिए किट
कुलाधिपति ने चंदौली जिले के जिलाधिकारी चंदौली निखिल टीफू ,मुख्य विकास अधिकारी संतोष कुमार श्रीवास्तव और राजभवन के सहयोग से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को साड़ी, किट दिया। किट में खिलौने, स्कूल बैग, तौलिये, नेल कटर था।
राज्यपाल व कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा के दो स्तंभ हैं, पहला संस्कृत और दूसरा संस्कृति। हर राष्ट्रवादी को संस्कृत पढ़ना चाहिए। संस्कृत में हमें अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। वह बृहस्पतिवार को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के मुख्य भवन में 42वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि यहां इतने बड़े-बड़े पंडित बैठे हैं लेकिन विश्वविद्यालय से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। ये गलत है। हमें विश्वविद्यालय की चहारदीवारी से बाहर निकलकर संस्कृत का प्रचार-प्रसार करना होगा। उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और मेधावी छात्र-छात्राओं से आह्वान किया कि आप कक्षा पांचवीं तक के लिए 50 वाक्य बनाकर दें। उसे गांव-गांव और घर-घर पहुंचाने का काम मैं करूंगी। अगर आपके पास पुस्तक छपवाने के पैसे नहीं हैं तो मैं उसके लिए पैसे दूंगी।
कुछ वर्षों बाद जब ये बच्चे आपके विश्वविद्यालय में आएंगे तो कहेंगे आपने जो वाक्य की किताब दी थी, उसके कारण ही मेरी संस्कृत में रूचि बढ़ी। सोचिए ये पीढि़यां आपको इस तरह याद करेंगी। इसलिए आप ऐसा लक्ष्य निर्धारित करें जिससे कि 50 साल के बाद की पीढ़ी आपको इसलिए याद करे कि आपने संस्कृत और संस्कृति के कुछ काम किया। कुलाधिपति ने विश्वविद्यालय के आचार्यों से आग्रह करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए संस्कृत के शब्दों की छोटी किताब प्रकाशित की जाए जिससे संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार और विकास तीव्र गति से हो सके। राज्यपाल ने कहा कि हर स्कूलों में संस्कृत के नाटक होने चाहिए। ज्ञान का विस्तार होना चाहिए।
आठ साल तक के बच्चों को दें अच्छी शिक्षा
कुलाधिपति ने कहा कि बच्चे आने वाले भारत का भविष्य हैं। आठ साल की आयु में बच्चे जो भी पढ़ते हैं, सुनते हैं और देखते हैं, उसका 80 फीसदी तक सीख जाते हैं। इसके बाद तो बाकी जीवन में सिर्फ 20 फीसदी ही सीखते हैं। इसलिए आठ वर्ष तक के बच्चों को अच्छी शिक्षा, संस्कार और माहौल देना चाहिए। जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके। उनकी स्मृतियां उस समय तीव्र होती हैं। ये भावी पीढ़ी के भविष्य हैं।