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संस्कृति संसद का शुभारंभ: संस्कृति और धर्म विरोधी शक्तियों के विरुद्ध एकजुट हों साधु-संत, संतों ने कही ये बात

Wed, 04 Nov 2026 12:50 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Wed, 04 Nov 2026 12:50 PM IST
सार

वाराणसी में तीन दिवसीय संस्कृति संसद का शुभारंभ हो गया है। पहले दिन संतों ने कहा कि सनातन धर्म पर चारों ओर से हो रहे षड्यंत्रों का मिलकर मुकाबला करें। सनातन की रक्षा के लिए कानून में बदलाव और गो संरक्षण के लिए कानून बनाने पर जोर दिया। 

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Sadhus and saints should unite against forces that oppose culture and religion said in varanasi
संस्कृति संसद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संस्कृति संसद में देशभर से जुटे साधु-संतों ने सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे हमलों के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्होंने सभी पंथों के साधु-संतों से एकजुट होकर धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया। संतों ने कहा कि सनातन धर्म सुरक्षित रहेगा, तभी राष्ट्र भी सुरक्षित रहेगा। इसके लिए समाज को जागरूक करने के साथ युवाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी। उन्होंने समाज और राष्ट्र के विकास में युवाओं से योगदान देने की अपील की। साथ ही विभिन्न कानूनों में बदलाव और गो संरक्षण के लिए कानून बनाने की जरूरत बताई।

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सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में तीन दिवसीय संस्कृति संसद की शुरुआत हुई। अध्यक्षता कर रहे स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं। ऐसे में सभी को जागरूक होना होगा। गोमाता भारतीय संस्कृति का आधार हैं। उनकी रक्षा के लिए कानून बनाना जरूरी है। 
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महामंडलेश्वर रवींद्रपुरी महाराज ने कहा कि संत समाज ने हमेशा धर्म की रक्षा की है। अब एक बार फिर सनातन धर्म पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में संतों को आगे आकर अपनी भूमिका निभानी होगी।
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अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि देश में सनातन धर्म के खिलाफ अनेक षड्यंत्र हो रहे हैं। संतों को इन चुनौतियों को समझकर संस्कृति और धर्म विरोधी शक्तियों के खिलाफ काम करना होगा। उन्होंने कहा कि जेन-जी के नाम पर युवाओं को बांटना उचित नहीं है। युवाओं को ऐसी कोशिशों से दूर रहकर समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देना चाहिए। 

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश ने समाज को बांटने वाले कानूनों में बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप और बेटियों की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी से जुड़े कानूनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे परिवारों में समस्याएं बढ़ी हैं।

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक ने हिंदुओं की जनसंख्या में असंतुलन और धर्मांतरण की चुनौती से निपटने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मंचों से भगवान राम, शिव और कृष्ण पर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां होने लगी हैं। ऐसे में संत समाज को लोक जागरण की जिम्मेदारी निभानी होगी। 

इस दौरान विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय का सम्मान हुआ। अतिथियों ने ‘संस्कृति पर्व’ पत्रिका का लोकार्पण किया। स्वागत प्रो. अरविंद जोशी और प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने किया। संचालन संत समिति के कोषाध्यक्ष जनार्दन हरि ने किया।

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संस्कृति संसद - फोटो : अमर उजाला
गुरुकुलों के साथ संस्कार केंद्रों की भी जरूरत
प्रख्यात कथावाचक आचार्य सुधांशु महाराज ने कहा कि सनातन और संस्कृति की रक्षा के लिए गुरुकुलों के साथ संस्कार केंद्रों की भी जरूरत है। संत समाज को इनका विस्तार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेन-जी देश के युवाओं की पहचान नहीं है। युवाओं का असंतोष समाज और व्यवस्था को सजग करने का माध्यम है। उनके विरोध को नकारात्मक रूप में नहीं देखना चाहिए। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर ने कहा कि युवाओं को भ्रमित हुए बिना राष्ट्र के विकास के लिए काम करना चाहिए।

ये रहे मौजूद
कार्यक्रम में भारतीय संत समिति के अध्यक्ष कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य महाराज, विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय, महामंडलेश्वर मनमोहन दास ‘राधे-राधे बाबा’, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष पद्मभूषण प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय और महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी सहित विभिन्न प्रांतों के 1500 से अधिक संत, महामंडलेश्वर, आचार्य और उनके शिष्य शामिल हुए।

पेंटिंग और छायाचित्रों में दिखी काशी, मथुरा और प्रयाग की संस्कृति
संस्कृति संसद में कला और संस्कृति के विविध रंगों से सजी प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। इसमें देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां और छायाचित्र प्रदर्शित किए गए। पद्मश्री दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग और पद्मश्री श्याम शर्मा की हनुमान जी पर आधारित कलाकृति विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। करीब सौ चित्रों और छायाचित्रों में काशी के घाट, रामलीला, नागनथैया, भरत मिलाप, मंदिर, भगवान शिव, बरसाने की होली और महाकुंभ की झलक देखने को मिली। शिंजो आबे परिसर में लगी प्रदर्शनी में अशोक सिंघल की पेंटिंग भी प्रदर्शित की गई। इसमें थाईलैंड के रुबेन तस्मार, अमेरिका के डॉ. वेनिडेक्टो रियार्स और एरिन ब्रिडेन ब्रिक तथा तुर्की की देरेया अजार अस्ता सेवर के छायाचित्र भी शामिल रहे। वहीं, संगीत संध्या में कलाकारों ने गायन, वादन और नृत्य की प्रस्तुतियों से दर्शकों को आनंदित किया।
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