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शोध : निकिल मुक्त स्टील के धातु से अंग प्रत्यारोपण का खर्च होगा कम

Fri, 02 Jul 2021 01:15 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 02 Jul 2021 01:15 AM IST
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Research: The cost of organ transplantation will be lower with nickel-free steel metal
हड्डियों में फ्रैक्चर होने के बाद अंग प्रत्यारोपण में अब निकिल मुक्त स्टील के धातु का प्रयोग किया जा सकेगा। यह धातु अंग प्रत्यारोपण में उपयोग होने वाले सर्जिकल ग्रेड स्टील से सुरक्षित, मजबूत और हल्का है। वहीं, निकिल रहित होने के कारण यह 100 रुपये प्रति किलोग्राम सस्ता भी पड़ेगा। आईआईटी बीएचयू मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग की टीम ने इसे बनाने में सफलता हासिल की है। इसमें आईएमएस बीएचयू के चिकित्सक ने भी सहयोग किया है
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मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गिरिजा शंकर महोबिया के मुताबिक, वर्तमान में अंग प्रत्यारोपण में सर्जिकल ग्रेड स्टील की धातु (316 एल) का प्रयोग किया जा रहा है। इसमें टाइटेनियम और कोबाल्ट प्रीमियम का प्रयोग होता है। जिसकी वजह से यह ज्यादा महंगा होता है। इसमें निकिल की मात्रा अधिक होने से शरीर में एलर्जी के साथ ही कैंसर, सूजन, प्रत्यारोपण वाली जगह पर त्वचा संबंधी परेशानियां शुरू हो जाती हैं। अब निकिल मुक्त सर्जिकल ग्रेड स्टील धातु के प्रयोग से यह समस्याएं नहीं होंगी। त्रिवेंदम के लैब में चूहों खरगोश और सुअर पर इसका परीक्षण किया गया। आईएमएस बीएचयू के प्रो. अमित रस्तोगी ने खरगोशों पर नई धातु का विस्तृत परीक्षण किया और पाया कि यह बिल्कुल सुरक्षित है। डा. एन शांथी श्रीनिवासन और डॉ. कौशिक चट्टोपाध्याय ने धातु के यांत्रिक व्यवहार को समझने में भूमिका निभाई है।
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पिछले साल अप्रैल में फाइल हुआ पेटेंट
डॉक्टर महोबिया ने बताया कि 2015 में इस्पात मंत्रालय को प्रोजेक्ट का प्रस्ताव भेजा गया था। 2016 में शोध को हरी झंडी मिल गई थी। मंत्रालय की ओर से 2 करोड़ 84 लाख रुपए का फंड भी मिला था। अप्रैल 2020 में पेटेंट भी फाइल किया जा चुका है। इसका प्रयोग शरीर के अनुकूल होने के कारण स्टेंट, पेसमेकर, वॉल्व आदि बनाने में भी किया जा सकता है। उधर आईआईटी के निदेशक प्रोफेसर प्रमोद जैन ने इस शोध को जनमानस के लिए उपयोगी बताया। कहा कि कई इस्पात निर्माताओं और प्रत्यारोपण उपकरण बनाने वाले उद्योगों ने इसमें अपनी रुचि दिखाई है। इसमें आईएमएस बीएचयू, राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केंद्र पुणे, चित्रा तिरुनाल आयुर्विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान त्रिवेंद्रम सहित अन्य संस्थानों से मदद ली गई।
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