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इस कारण घट रही कौवों की प्रजनन क्षमता, पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

Fri, 28 Sep 2018 03:47 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Fri, 28 Sep 2018 03:47 PM IST
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Reproduction capacity decrease of crows due to this reason
कौआ
सुबह जगते ही कौवों की कांव कांव अब नहीं सुनाई देती। पितृपक्ष में भी कौवे देखने को नहीं मिल रहे हैं। कौवों की इस घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरणविद भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में ही सरंक्षण को लेकर कोई उपाय नहीं किया गया तो यह भी विलुप्त हो जाएंगे।
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लगातार पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई, बढ़ते जा रहे कंक्रीट के जंगल का असर पर्यावरण पर तो पड़ ही रहा है, पशु पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही वर्तमान में बदलते खान पान और लगातार खेतों में हो रहे कीटनाशकों के प्रयोग से आम आदमी के शरीर के अलावा पशु पक्षियों का जीवन चक्र भी प्रभावित हो रहा है।
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इसका सबसे अधिक पक्षियों में गौरैया और कौवों पर देखने को मिल रहा है। गौरैया को तो लोगों ने संरक्षण करना शुरू कर दिया लेकिन कौवों की जनसंख्या लगातार कम होती चली जा रही है। यही स्थिति  रही तो कौवे भी गिद्घ की तरह गायब हो जाएंगे।
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बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं। इसमें एक तो पेड़ों की कटाई तो है ही, क्योंकि ये पेड़ों की खोह में ही अपना घोसला बनाते हैं। वहीं दूसरा फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे कीटनाशकों से वे खेतों में पानी पीने के चलते उनका प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है। 

कौवों का महत्व

Reproduction capacity decrease of crows due to this reason
वैसे तो कौवों का सबसे अधिक महत्व पितृपक्ष में है। यह माना गया है कि पितर कौवों के माध्यम से ही जमीन पर आते हैं और भोजन करने के बाद खुश हो जाते हैं, लेकिन वैसे भी कौवे पहले आंगन में आकर बैठकर बोलते थे, तो इसे किसी मेहमान के आने या किसी शुभ समाचार का सूचक माना जाता था।

मुख्य वन मंडलाधिकारी केके पांडेय का कहना है कि कौवा पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी पक्षी है। बदलते परिवेश से कौवे अब शहरों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों विशेष में समूह में सिमट गए हैं। इनकी संख्या कम होती जा रही है। वन विभाग ने कभी इनकी गणना तो नहीं कराई है, लेकिन इसके लिए शासन को पत्र लिखकर इनके संरक्षण को लेकर चर्चा की जाएगी। 
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