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नशामुक्ति के लिए रवि और दिव्यांशु ने बनाया ग्रीन ग्रुप, चार साल पहले शुरू मिशन का बढ़ रहा दायरा

Sun, 12 Jan 2020 12:44 PM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sun, 12 Jan 2020 12:44 PM IST
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Ravi & Divyanshu create group for de-addiction, growing scope of mission started four years ago
रवि मिश्रा और दिव्यांशु उपाध्याय - फोटो : a

नशाखोरी के खिलाफ राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन धरना-प्रदर्शन और आंदोलन तो खूब करते हैं, लेकिन काशी के युवाओं ने जो कर दिया है, वो एक मिसाल बन गया है। युवाओं में नशाखोरी दूर करने के लिए रवि मिश्रा और दिव्यांशु उपाध्याय ने 2015 में एक शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने महिलाओं की मदद ली और आज बनारस ही नहीं बल्कि देश-विदेश से लोग उनके कार्यों को सराहने के साथ ही मदद के लिए भी खड़े हैं।

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बीएचयू के छात्र रहे रवि और दिव्यांशु ने अपने इस अभियान को पूरा करने के लिए महिलाओं की मदद से एक संस्था बनाई, जिसको होप वेलफेयर संस्था का नाम दिया। इनकी टीम में बीएचयू, काशी विद्यापीठ आदि शिक्षण संस्थानों के छात्र-छात्राएं भी शामिल हैं। चार साल पहले महज एक गांव से शुरू हुए अभियान में अब तक वाराणसी-मिर्जापुर-जौनपुर में 55 गांवों में ग्रीन ग्रुप का काम चल रहा है। सोनभद्र और अयोध्या में भी महिलाओं का प्रशिक्षण चल रहा है।

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गांवों में ही चलाते हैं अभियान

होप वेलफेयर संस्था के बारे में दिव्यांशु का कहना है कि गांवों को कार्यक्षेत्र इसलिए बनाया गया कि यहां के युवा और पुरुष नशाखोरी में अधिक संलिप्त हैं। इसमें सबसे अधिक संख्या युवाओं की है। वह न तो पढ़ाई करना चाहते हैं और न ही नशा छोड़ने को राजी थे। ऐसे में इन लोगों से नशा छुड़ाना बहुत मुश्किल था।

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यहीं सोचकर गांव की महिलाओं का ग्रीन गुप बनाया। दिव्यांशु का कहना है कि ग्रुप की महिलाओं को दो महीने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें सरकार की योजनाओं, अक्षर ज्ञान के साथ-साथ आत्मरक्षा हेतु कराटे की ट्रेनिंग दी जाती है। गांव में घरेलू हिंसा, जुआ और नशे को रोकना साथी साथ बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना और सप्ताह में एक दिन स्वच्छता को लेकर अभियान चलाया जाता है।

इनसे मिली सराहना

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी, उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक, केंद्रीय सचिव चेतन शंघाई, बीएचयू और विद्यापीठ के कुलपति भी इनकी सराहना कर चुके हैं। साथ ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और कई यूरोपीय देशों में इन महिलाओं के कार्यों पर डाक्यूमेंट्री बन चुकी है।

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