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ये लीला अद्भुत है!: 200 साल पुरानी श्रीरामचरितमानस की पोथी से शुरू होती रामनगर की रामलीला, इसके बारे में पढ़ें

Sat, 07 Oct 2023 11:51 AM IST
किरन रौतेला हीरालाल चौरसिया, अमर उजाला, वाराणसी
हीरालाल चौरसिया, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Sat, 07 Oct 2023 11:51 AM IST
सार

हर दिन लीला शुरू होने के पहले लीला व्यास श्रीरामचरितमानस की पोथी की पूजा और प्रार्थना कर लीला की शुरू करते हैं। व्यास परंपरा और पोथी की रक्षा कर रहे पं. रामनारायण पांडेय ने बताया कि मेरे पूर्वजों ने बताया था कि रामनगर की रामलीला 1806 में शुरू हुई थी।

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Ramnagar's Ramleela starts from the 200 year old book of Shri Ramcharitmanas, read about it
200 साल पुरानी श्रीरामचरितमानस की पोथी से शुरू होती रामनगर की रामलीला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रामनगर की रामलीला यूं ही प्रसिद्ध नहीं है, इससे जुड़ी एक-एक वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि अद्भुत और विशेष है। इसी में से एक है श्रीरामचरितमानस की पोथी...। जो 200 साल से अधिक पुरानी है, इसका वंदन व नमन करके ही रामलीला शुरू होती है। यह आम मानस की पोथियों से अलग है। इसमें दोहे और चौपाई सटाकर लिखे गए हैं। यह पढ़ना व समझना आमजन के लिए मुश्किल है। 

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हर दिन लीला शुरू होने के पहले लीला व्यास श्रीरामचरितमानस की पोथी की पूजा और प्रार्थना कर लीला की शुरू करते हैं। व्यास परंपरा और पोथी की रक्षा कर रहे पं. रामनारायण पांडेय ने बताया कि मेरे पूर्वजों ने बताया था कि रामनगर की रामलीला 1806 में शुरू हुई थी। इसके कुछ साल पहले से ही श्रीरामचरितमानस पोथी रखी गई है। पोथी की ऊंचाई करीब एक फीट है। इसकी छपाई चिकने पत्थरों (लीथो प्रिटिंग) से गई है। शुरू में लीला का संवाद इसी से होता था, लेकिन अब दूसरे मानस के ग्रंथों से होता है। मानस की पोथी को केवल पूजन करने के लिए लाया जाता है।

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Ramnagar's Ramleela starts from the 200 year old book of Shri Ramcharitmanas, read about it
रामनगर की रामलीला - फोटो : अमर उजाला

पांडेय परिवार की छठीं पीढ़ी कर रही रक्षा

रामलीला के व्यास परंपरा को पांडेय परिवार की छठीं पीढ़ी निभाती आ रही है। उन्हीं को 200 साल से पुरानी श्रीरामचरितमानस पोथी की रक्षा की जिम्मेदारी मिली है। पांडेय परिवार में पं. स्वयंवर प्रसाद पांडेय, पं. पदारथ पांडेय, पं. क्षत्रपाल पांडेय, पं. अनिरुद्ध पांडेय, पं. लक्ष्मीनारायण और पं. हृदय नारायण पांडेय हैं।

काष्ठ जीह्वा स्वामी ने दिया था लीला को आकार

पं. रामनारायण पांडेय ने बताया कि चुनार के पर्वतों पर तपस्या के बाद 1795 में रामनगर के गिरीजा देवी मंदिर में विश्राम करने पहुंचे काष्ठ जीह्वा स्वामी के काशी नरेश ने दर्शन किए थे। उन्हें किले में ले गए। तबसे दरबार में सप्त ऋषियों के रखने की परंपरा शुरू हुई थी। काष्ठ जीह्वा स्वामी ने 108 ग्रंथों की रचना की और रामनगर की रामलीला के स्वरूप व स्थलों का नामांकरण किया था। 

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