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अयोध्या का सिंहासन त्याग राम को मनाने निकले भरत
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रामनगर। अयोध्या का सिंहासन त्यागकर भरत भगवान राम को मनाने के लिए वन को चल पड़े। उन्होंने अपनी माता कैकेई की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। भरत को आता देखकर निषादराज को भ्रम हो जाता है कि भरत आक्रमण करने आ रहे हैं। गुरु वशिष्ठ भरत को बताते हैं कि यह राम के मित्र हैं। निषाद राज भरत को लेकर सभी के साथ गंगा के तट पर पहुंचते हैं। गंगा पार करके सभी प्रयाग पहुंचते हैं। रामनगर की रामलीला के 11 वें दिन रविवार को श्री अवध में भरतआगमन, सभा, चित्रकूट प्रयाण, निषाद मिलन, गंगावतरण, भारद्वाज आश्रम की लीलाएं हुईं।
भरत अपने ननिहाल से लौटे तो कै केई उनके आने की खबर पाकर आरती लेकर दौड़ती हैं। वह अपने मायके का समाचार पूछती हैं। भरत कहते हैं कि सबकुछ ठीक है, वह अपनी माता से अपने कुल का कुशलक्षेम पूछते हैं। जब कैकेई उनको अपनी करनी के बारे में बताती है तो भरत उनको भला-बुरा कहते हैं। शत्रुघभन मंथरा को लात मारते हैं और वह गिर पड़ती है। वह उसकी चोटी पकड़कर घसीटने लगते हैं। भरत उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं। दोनों भाई माता कौशल्या के पास जाते हैं। भरत अपने आप को कोसते हैं। माता कौशल्या उनको समझाती है कि होनी को कोई टाल नहीं सकता। भरत भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचकर विश्राम करते हैं। चित्रकूट में भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया गया।
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भरत अपने ननिहाल से लौटे तो कै केई उनके आने की खबर पाकर आरती लेकर दौड़ती हैं। वह अपने मायके का समाचार पूछती हैं। भरत कहते हैं कि सबकुछ ठीक है, वह अपनी माता से अपने कुल का कुशलक्षेम पूछते हैं। जब कैकेई उनको अपनी करनी के बारे में बताती है तो भरत उनको भला-बुरा कहते हैं। शत्रुघभन मंथरा को लात मारते हैं और वह गिर पड़ती है। वह उसकी चोटी पकड़कर घसीटने लगते हैं। भरत उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं। दोनों भाई माता कौशल्या के पास जाते हैं। भरत अपने आप को कोसते हैं। माता कौशल्या उनको समझाती है कि होनी को कोई टाल नहीं सकता। भरत भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचकर विश्राम करते हैं। चित्रकूट में भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया गया।
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