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भूस्खलन से पहले ही मिल जाएगा खतरे का सिग्नल, 10 शैक्षणिक संस्थानों ने शुरू की पहल

Sun, 08 Jul 2018 03:30 PM IST
तबस्सुम, अमर उजाला, वाराणसी
तबस्सुम, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 08 Jul 2018 03:30 PM IST
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People will get alert signal before Landslide
भूस्खलन के रिस्क और कारण का लगाया जा रहा पता
बारिश के दौरान हर साल पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन से होने वाले जान माल के नुकसान को बचाने की कोशिश शुरू हो गई है। दस शैक्षणिक संस्थानों के तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर पहाड़ी क्षेत्रों के दुर्गम रास्तों का अध्ययन कर रहे हैं।
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अध्ययन के जरिए इन क्षेत्रों में होने वाले भूस्खलन के खतरे को पहले ही पता लगाने की कोशिश की जा रही है, जिससे भूस्खलन आने से पहले ही उन इलाकों को अलर्ट किया जा सके। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के इस प्रोजेक्ट की अगुवाई पृथ्वी विज्ञान के विशेषज्ञ व काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टीएन सिंह कर रहे हैं।
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डीएसटी के इस प्रोजेक्ट पर आईआईटी मुंबई, आईआईटी रुड़की, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट समेत दस तकनीकी संस्थान व विश्वविद्यालय मिलकर काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के कोआर्डिनेटर आईआईटी मुंबई के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. टीएन सिंह बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट के तहत हम दुर्गम पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन होने के कारण और उसके निदान पर अध्ययन कर रहे हैं।
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इस अध्ययन में हम ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित कर रहे हैं, जहां भूस्खलन का रिस्क ज्यादा है। वहां क्या संरक्षात्मक उपाय किए जा सकते हैं, हम वह बताएंगे। कहां रॉक बोल्ट लगाया जा सकता है, कहां रॉक फॉल बैरियर लगाए जा सकते हैं, बाकायदा इसका पूरा मैप तैयार किया जा रहा है।

कुछ ऐसे क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं, जहां बार बार भूस्खलन हो रहा है। पत्थरों और पहाड़ों के भीतर होने वाले मूवमेंट के आधार पर इसके मूल कारण का पता लगाया जा रहा है।

ये शैक्षणिक संस्थाएं प्रोजेक्ट में कर रही हैं हिस्सेदारी

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काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि ये अध्ययन खास तौर से उत्तराखंड में किया गया है, इस लिहाज से इस प्रोजेक्ट की पूरी रिपोर्ट उत्तराखंड सरकार को भी दी जाएगी। प्रोजेक्ट का 70 फीसदी काम पूरा हो चुका है।

हाल ही में आईआईटी रुड़की में इसकी रिव्यू बैठक भी हो चुकी है। फाइनल रिव्यू बैठक अगस्त के अंतिम सप्ताह में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में होगी, जिसमें इसकी विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाएगी।

इस अध्ययन से भूस्खलन आपदा से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी ये महत्वपूर्ण साबित होगा।  

आईआईटी मुंबई, आईआईटी रुड़की, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, पंजाब यूनिवर्सिटी, पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी जालंधर, कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग चंडीगढ़, श्रीनगर यूनिवर्सिटी उत्तराखंड, गढ़वाल यूनिवर्सिटी और नैनीताल यूनिवर्सिटी इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। 
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