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नजीर बनारसी की जयंती विशेष: हमारे कद पर न हंसना, हमारा कद वो है जिसकी लाल बहादुर ने आबरू रखी...
Fri, 25 Nov 2022 05:38 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: किरन रौतेला
Updated Fri, 25 Nov 2022 05:38 PM IST
सार
पेशे से हकीम और दिल से शायर नजीर ने जो भी गढ़ा वह हर किसी के लिए नजीर बन गया। 25 नवंबर को नजीर बनारसी की जयंती की पूर्व संध्या पर उनके बेटे शगीर ने पिता की यादों को अमर उजाला से साझा किया। उनका जन्म 1925 में मदनपुरा में हुआ था।
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नजीर बनारसी
विस्तार
बनारसी मिजाज के अक्खड़-फक्कड़ शायर नजीर बनारसी का अंदाज ही सबसे जुदा था। मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने वाले नजीर की कविताओं में जो गहराई और तंज है वह आज भी ताजा है। उनकी शायरी में बनारसी का असली चेहरा नजर आता है। नजीर बनारसी की कविताओं की धड़कन मोहब्बत, भाईचारा और देशप्रेम है। पेशे से हकीम और दिल से शायर नजीर ने जो भी गढ़ा वह हर किसी के लिए नजीर बन गया। 25 नवंबर को नजीर बनारसी की जयंती की पूर्व संध्या पर उनके बेटे शगीर ने पिता की यादों को अमर उजाला से साझा किया। उनका जन्म 1925 में मदनपुरा में हुआ था।
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नजीर बनारसी का पुश्तैनी मकान
- फोटो : अमर उजाला
मो. शगीर ने बताया कि ताशकंद समझौते के बाद 26 जनवरी को लाल किले पर मुशायरे में शामिल होने के लिए अब्बा को दिल्ली आमंत्रित किया गया था। वह छोटे कद के थे और माइक ऊंचाई पर लगा हुआ था। जब वह मंच पर खड़े हुए तो पहले माइक को नीचे किया और उन्होंने लाल किले से शेर पढ़ा हमारे कद पर न हंसना हमारा कद वो है जिसकी लाल बहादुर ने आबरू रखी है। गंगा तो उनकी हर कविता में बहती थी। उनका अधिकांश समय गंगा घाट पर ही बीतता था और कई-कई रातें तो घाटों पर ही बीत जाती थीं। उन्होंने आंखों से जो भी देखा उसे अपनी शायरी में उतार दिया। गर्व से कहते थे कि मैं वो काशी का मुसलमान हूं नजीर, जिसको घेरे में लिए रहते हैं, बुतखाने कई...। बनारस उनके लिए किसी पारस से कम नहीं था।
घाट किनारे मंदिरों के साए में बैठकर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसा दिखता है, बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी, मंदिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी। जब चांदनी रातों में हम-तुम गंगा किनारे होते थे...।
मदनपुरा के तीन मंजिला मकान की पहले तल के बरामदे के कमरे में तख्त पर बैठकर नजीर बनारसी शायरी गढ़ा करते थे। मो. शगीर ने बताया कि अब्बा के शेर पढ़कर हमें भी शायरी करने का मन तो करता हैं लेकिन अब्बा कहते थे कि शायरी मत करना, अगर कामयाब हो गए तो ठीक वरना बर्बाद हो जाओगे। छोटे बेटे रियाज अहमद ने बताया कि बंटवारे के समय जब पाकिस्तान बना तो अब्बा ने अपना वतन छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। उनकी इच्छा थी कि इसी मिट्टी में खेले और कयामत के दिन के लिए इसी मिट्टी में दफन हो जाएंगे। कई बार बुलावे के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम तक नहीं रखा।
घाट किनारे मंदिरों के साए में बैठकर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसा दिखता है, बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी, मंदिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी। जब चांदनी रातों में हम-तुम गंगा किनारे होते थे...।
मदनपुरा के तीन मंजिला मकान की पहले तल के बरामदे के कमरे में तख्त पर बैठकर नजीर बनारसी शायरी गढ़ा करते थे। मो. शगीर ने बताया कि अब्बा के शेर पढ़कर हमें भी शायरी करने का मन तो करता हैं लेकिन अब्बा कहते थे कि शायरी मत करना, अगर कामयाब हो गए तो ठीक वरना बर्बाद हो जाओगे। छोटे बेटे रियाज अहमद ने बताया कि बंटवारे के समय जब पाकिस्तान बना तो अब्बा ने अपना वतन छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। उनकी इच्छा थी कि इसी मिट्टी में खेले और कयामत के दिन के लिए इसी मिट्टी में दफन हो जाएंगे। कई बार बुलावे के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम तक नहीं रखा।