काशी का पुरनका रंग : चुनटदार अद्धी, मलमल का कुर्ता और बेफिक्री चाल... ये था बनारस का हाल
Varanasi News: धर्मेंद्र राय ने बताया कि शोले में लीला मिश्रा का अभिनय खांटी बनारसी संस्कृति और सहजता की जीवंत झलक था। उनके संवाद, हाव-भाव और अंदाज में बनारस की अलमस्त चाल साफ दिखाई देती थी। उन्होंने कहा कि लीला मिश्रा ने अपने अभिनय से भारतीय सिनेमा में बनारसी माटी की खुशबू को अमर कर दिया।
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25 साल पहले बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, अपने आप में पूरी संस्कृति था। यहां आदमी की पहचान उसके पेशे से कम, उसके संस्कार और इलाके से ज्यादा होती थी। चाल में ठहराव, बातों में अपनापन और जीवन में बेफिक्री यही उस दौर की काशी की असली तस्वीर थी।
बनारस की पहचान उसके लोगों के ठाठ, मिजाज और संस्कार से होती थी। फिल्म शोले में मौसी का किरदार निभाने वाली लीला मिश्रा को देख लीजिए, उनके अभिनय में खांटी बनारसीपन साफ झलकता है। घूंघट संभालने का अंदाज, सच्ची-सपाट बात और व्यवहार में एक अलग ठसक। तब बनारस में घालमेल कम था।
साहित्यकार अपनी दुनिया में, संगीतकार अपने रियाज में, नेता राजनीति में, पत्रकार खबरों में और इलाके के दबंग अपनी सीमाओं में रहते थे। एक-दूसरे के काम और दायरे का लिहाज था। गुंडे-मवाली भले किसी से न डरें, लेकिन क्राइम रिपोर्टर से दूरी बनाकर रखते थे।
उस दौर में बड़ा आदमी वही माना जाता था जो रिक्शे की फुल सीट रिजर्व करा ले। लहुराबीर से गोदौलिया तक डबल सवारी चवन्नी-चवन्नी में शेयर होकर चलती थी। रिक्शेवाला इशारे में पूछता...फुल कि हाफ? सुबह की शुरुआत बाबा दरबार और संकट मोचन मंदिर के पट खुलने से होती थी। आरती के बाद कचौड़ी-जलेबी की दुकानों पर भीड़ लग जाती। गोदौलिया के जलजोग से लेकर विश्वेश्वरगंज के राम भंडार और विश्वनाथ भंडार तक सुबह से लाइनें दिखती थीं।
घर-घर पान की डलिया, पीकदान और संयुक्त परिवार की अलग संस्कृति थी। किसी न किसी सदस्य की जिम्मेदारी पीकदान को राख से रगड़कर चमकाने की होती थी। चुनटदार अद्धी, मलमल का कुर्ता और बेफिक्र चाल बनारसी जीवनशैली का हिस्सा थे। दालमंडी से गुजरते हुए कोठों से घुंघरू, तबले और सारंगी की आवाज सुनाई देती थी। हर मोहल्ले की अपनी पहचान थी... लोहटिया, दलहट्टा, हड़हासराय और चौक, सबकी अलग पहचान और किस्से थे।
गंगा किनारे जीवन और भी धीमा और सुंदर था। नाविक और सवारी के बीच कुछ ही देर में अपनापन बन जाता। उनकी बातों में दर्शन भी होता और हास्य भी। यही बनारस था...धीमा, गहरा और आत्मीय। 25 साल पहले की काशी में भागदौड़ कम थी, जीवन में ठहराव ज्यादा। शहर चलता कम था, बहता ज्यादा था-ठीक मां गंगा की धारा की तरह।