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शोर बहुत, बैठकें तमाम पर सुधार के लिए काम बहुत कम

Tue, 01 Dec 2015 01:37 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 01 Dec 2015 01:37 AM IST
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Noise at all meetings, a very much less work for improvement

 गंगा के जिस घाट पर 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तुलसी दास ने मानस की चौपाइयां लिखीं, जहां से मानस लेखन का आंदोलन देश भर में फैला,

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काशी की उस आध्यात्मिक पीठ को संभाल रहे संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र 15 साल से बनारस को खोदने, ढकने की चल रही नूरा-कुश्ती को लेकर चिंतित हैं।
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 एक तरफ विकास की उड़नझाई योजनाओं पर ताबड़तोड़ होती बैठकें और दूसरी ओर चील की तरह मंडराते ठेकेदारों की भीड़ के अलावा अभी उन्हें कहीं कुछ नहीं दिखा।
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आईआईटी बीएचयू के इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग विभाग में माइक्रोवेव और सेंसर के विशेषज्ञ प्रो. मिश्र विकास के मॉडल का सवाल आते ही गंभीर हो जाते हैं।
कहते हैं बनारस वो विशेषण है, जो किसी भी व्यक्ति और वस्तु को आम से खास बना देता है। बनारसी साड़ी, बनारसी लंगड़ा, बनारसी पान, बनारसी पंडे, बनारसी ठग दुनिया में मशहूर हैं।
कुछ करने से पहले इस शहर को समझना होगा। जो इसकी धमनियों से वाकिफ हैं, उनसे बनारस के बारे में पूछेंगे तो असल खुशबू का पता चलेगा।
 प्लानर तो बाबतपुर हवाई अड्डे पर उतर रहे हैं और शाम तक गोदौलिया-हड़हा सराय के बीच मेट्रो रेल चलाने की योजना बनाकर निकल जा रहे हैं।
बनारस की वास्तविक जरूरतें पीछे छूटती जा रही हैं। वह चार दशक पहले के अतीत में चले जाते हैं, जब वह महज 10 वर्ष के थे। तब बनारस के बड़े धन्नासेठ और घाट के गरीब परिवार के युवा एक साथ अखाड़े के मिट्टी खोदते नजर आते थे।
पत्थर की चिकनी गलियां, भवन ही नहीं उनमें रहने वाले लोग भी बेशकीमती थे। नालियों की सफाई भिश्ती मसक से पानी गिराकर तीन पहर करते थे।
गलियां और नालियां इतनी लकदक रहती थीं कि रईस भी पान की पीकें मारने में संकोच करते। लंका, सोनारपुरा, गोदौलिया, मैदागिन, मछोदरी, राजघाट तक ढलाई वाली पक्की सड़क थी।
पानी कहीं लगता नहीं था। अब गंगा के नाम पर बारहों महीने सड़कें खोदी जा रही हैं। लोग गड्ढों में गिर रहे हैं। जिस शहर में कभी सिर्फ ढाई लाख की आबादी के लिए मूलभूत सुविधाओं की डिजाइन की गई थी, उस पर अब 25 लाख लोगों का दबाव है।
जरूरत है पुराने शहर से छेड़छाड़ किए बिना भीड़ के दबाव को बांटने की। वह सुझाव देते हैं बीएचयू के पीछे वाले बाईपास से राजातालाब, कपसेठी, कालिका धाम, बाबतपुर, हरहुआ, चोलापुर, चिरईगांव इलाके में दिल्ली, गुड़गांव की तर्ज पर नया आधुनिकतम शहर बसाने का।
वहां से मेट्रो चलाकर पुराने शहर को लिंक किया जाना चाहिए, ताकि लोग आसानी से बनारस घूमकर आनंद उठा सकें।
चिंता जताते हैं कि अब बाहरी धनबलियों की भीड़ यहां के निवासियों को बाहर धकेल रही है। यहां बाबा विश्वनाथ का दरबार और उनसे जुड़ी उत्तरवाहिनी गंगा का अध्यात्म लोगों को सुख-शांति प्रदान करता है।
 विश्वनाथ मंदिर को ही लें तो वह सिर्फ मंदिर ही नहीं उसके आसपास की एक खास परंपरा है लेकिन सुनते हैं कि सरकार मंदिर के इर्द-गिर्द के भवनों को खरीद कर वहां का विस्तार करने जा रही है।

 इससे तो मूल बनारस उजड़ जाएगा। पक्के महाल के विस्तार की योजना ठीक नहीं है। वहां के मूल बाशिंदे विकास की इस दौड़ में धकेल दिए जाएंगे तो परंपराएं भी चली जाएंगी। वह इस शहर की टूटती परंपराओं का जिक्र करते हैं।
 कहते हैं कि उनकी जानकारी में माघ में गंगा पार वेदव्यास का बड़ा मेला लगता था, वह खत्म हो गया। काशी वैभव से नहीं, अध्यात्म से जानी जाती है।
प्रो. मिश्र श्लोक पढ़ते हैं- कास्यां वास: शताम संघ: गंगांभ: शिव पूजनम...। जो काशी वास करे विद्वानों के साथ रहे, गंगा नहाए और शिव की पूजा करे, वह काशी का सुख ले सकेगा।  

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