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'रिंकिया के पापा' गाकर सुर्खियों में है ये नाइजीरियन सिंगर, प्रवासी दिवस से जुड़ सकता है नाता

Tue, 15 Jan 2019 10:53 AM IST
utpal utpal अजय राय ,अमर उजाला,वाराणसी
अजय राय ,अमर उजाला,वाराणसी Published by: utpal utpal Updated Tue, 15 Jan 2019 10:53 AM IST
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nigerian singer samuel singh sing  a song rinkiya ke papa
नाइजीरिया के गायक सैमुअल सिंह - फोटो : social media
 ‘चट देनी मार देले खींच के तमाचा, हीं-हीं हीं-हीं हंस देले रिंकिया के पापा’। भोजपुरी का यह लोकगीत नाइजीरिया के गायक सैमुअल सिंह की आवाज में लोकप्रियता की नई बुलंदियां छू रहा है। इस गीत ने कैरिबियाई देशों में प्रचलित बैठक गाना और चटनी संगीत की याद ताजा कर दी है।
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प्रवासी भारतीय सम्मेलन में ट्रिनिडाड, टोबैगो और मॉरीशस से बड़ी संख्या में आ रहे भारतवंशियों की दिलचस्पी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी लोकसंगीत में अपनी जड़ें तलाशने में हो सकती है। बैठक गाने से हम दूर देश में रची-बसी अपनी गंगा-जमुनी तहजीब का मूल समझ सकते हैं।
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ट्रिनिडाड में चटनी संगीत के प्रणेता पाप गायक सुदर पोपो हैं, जिन्होंने भोजपुरी लोकगीतों को पाश्चात्य संगीत के साथ मिला कर नया ब्लेंड तैयार किया था। उनका गाया ‘फुलौरी बिन चटनी’ जस का तस उनके यहां के कंचन और बाबला ने गाया, जो पूरे देश में सुना गया।
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चटनी संगीत ट्रिनिडाड के अलावा मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम, जमैका, फिजी से लेकर दक्षिण अफ्रीका में भी लोकप्रिय है। इसमें ढोलक, तबला, मंजीरा, हारमोनियम, खड़ताल के अलावा बुलबुल तरंग (बेंजो जैसा बाजा) और धनताल (लोहे की रॉड) का इस्तेमाल होता है। 

अब यह सब पूर्वांचल के संगीत से गायब से भले ही हो गए हैं लेकिन इसके युवा कलाकारों की कमी नहीं है। इसी तरह बैठक गाना सूरीनाम का गीत है। यह सागर पार रोजगार की तलाश में गए भारतवंशियों की बैठक का गीता था। इसमें भोजपुरी को पारंपरिक लोक गीत समाहित है।

हारमोनियम, ढोलक और धनताल इसके मुख्य वाद्य हैं। इसके बड़े कलाकारों में रामदेव चैतू और द्रौपदी रहे हैं। यह नीदरलैंड में भी समान रूप से लोकप्रिय है। पहले सूरीनाम, ट्रिनिडाड और अन्य देशों से आने वाले छात्र काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत के माध्यम से अपना रिश्ता भारत से बनाते थे।

यह सिलसिला कम हो गया है लेकिन जिस तरह रिंकिया के पापा और ‘ लगावे लू जब लिपिस्टिक हिलेला आरा....’ जैसे गीत को सैमुअल सिंह जैसे गायकों ने स्वर दिया है। एक बार फिर पूर्वांचल का लोक संगीत पश्चिम के युवाओं के सिर चढ़कर बोलने लगा है। सैमुअल के गाए लोकगीतों पर तो मीम्स तक बनने लगी हैं। 
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