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तो वाजिब है केंद्र और प्रदेश पर एनजीटी का गुस्सा

Tue, 19 Jan 2016 02:19 AM IST
ब्यूरो, वाराणसी अमर उजाला
ब्यूरो, वाराणसी अमर उजाला Updated Tue, 19 Jan 2016 02:19 AM IST
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NGT at the center and state of the Rational anger

जीवनदायिनी गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की केंद्र और प्रदेश सरकार से नाराजगी वाजिब है।

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गंगा में मूर्ति विसर्जन पर रोक के सिवाय सरकारी स्तर पर दो साल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे गंगा में प्रदूषण का स्तर कम हो सके।
 बात अगर काशी की करें तो आज भी यहां दो दर्जन से अधिक छोटे-बड़े नाले सीधे गंगा में गिर रहे हैं। यानी रोजाना 300 एमएलडी गंदा पानी गंगा में बहाया जा रहा है।
ऐसा नहीं कि गंगा में प्रदूषण को लेकर सरकारें चिंतित नहीं। कार्ययोजनाएं तो कई बनीं, कुछेक पर काम भी शुरू हो गया मगर उसकी रफ्तार बेहद धीमी है।
हाईकोर्ट के सख्त तेवर के चलते मूर्ति विसर्जन तो रोक दिया गया मगर उद्योगों का कचरा, मवेशियों के कत्लगाह की गंदगी और अस्पतालों का बॉयो मेडिकल कचरा आज भी गंगा में जा रहा है।
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सरकारी फाइलों की बात करें तो पांच बड़े नाले और दर्जन भर छोटे नालों से सीवर का पानी गंगा में गिर रहा है। जबकि हकीकत यह है कि राजघाट से लेकर नगवां के बीच अकेले गंगा में दो दर्जन से अधिक नाले गिर रहे हैं।
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 हालांकि यहां दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) निर्माणाधीन हैं। गोइठहां में 120 एमएलडी की क्षमता का एसटीपी बन रहा है जबकि दीनापुर में 140 एमएलडी की क्षमता का एसटीपी निर्माणाधीन है।

 गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के महाप्रबंधक संजय सिंह के मुताबिक दोनों एसटीपी साल के अंत तक बनकर तैयार हो जाएंगे। संजय सिंह कहते हैं, आज भी 200 एमएलडी गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। एसटीपी बनने के बाद इसे सीधे गंगा में गिरने से रोका जा सकेगा।

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