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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Munshi Premchand's stories of the world in those moments talismanic

लमही में मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की तिलिस्मी दुनिया भी है

Fri, 29 Jul 2016 02:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 29 Jul 2016 02:13 AM IST
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 लमही महज एक गांव नहीं है, यहां मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का तिलिस्म भी है। ईदगाह के हामिद का चिमटा, गोदान का होरी और नमक का दरोगा का नायक...। सब लमही की उस लाइब्रेरी में अपनी शिद्दत के साथ मौजूद हैं। उपन्यास सम्राट की अमर कहानियों के बीच उनके बचपन की झलक दिखाता एक गिल्ली डंडा भी। सच ये है लमही की पहचान प्रेमचंद हैं और उनकी कहानियों का मर्म यहां की आब-ओ-हवा में घुला है।
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लमही गांव में मुंशी प्रेमचंद स्मारक स्थल पर प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही की एक लाइब्रेरी है। मुंशीजी के उपन्यासों, कहानियों की यह लाइब्रेरी सिर्फ एक पुस्तकालय तक ही सीमित नहीं है। कोशिश है कि न केवल उनकी किताबों को पढ़ा जाए, बल्कि प्रेमचंद को समझा जाना जाए। बचपन में मुंशी प्रेमचंद अक्सर दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा खेला करते थे। ये उनका पसंदीदा खेल था। इस लाइब्रेरी में मौजूद गिल्ली डंडा उनके बचपन के इसी पहलू को दिखाता है। इसी तरह यहां रखी पिचकारी भी उनके होली के त्योहार से जुड़े रहने का एहसास कराती है। भला ईदगाह कहानी के हामिद के चिमटे को कौन भूल सकता है। हामिद ने खिलौनों के बजाय इसे अपनी दादी के लिए खरीदा था।
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मानवीय संवेदना, पारिवारिक मूल्यों के उसी भाव को दर्शाता है यहां रखा चिमटा। यहां उपलब्ध किताबों की लंबी फेहरिस्त में वो ‘जमाना’ भी है, जिसे अंग्रेजों ने जला दिया और वो समर यात्रा भी इसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
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प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही के अध्यक्ष सुरेश चंद्र दुबे का कहना है कि इस गांव में अब भी कफन की बुधिया, बूढ़ी काकी और निर्मला जैसे किरदार हैं लेकिन अब उनके दर्द को लिखने वाला कोई नहीं। एक छोटी से लाइब्रेरी यहां खोल रखी है ताकि यहां के लोग मुंशी प्रेमचंद से जुड़े रहें। लोग आते हैं किताबें पढ़ते हैं और दिल से मुंशी जी से जुड़े रहते हैं। किताबों के साथ मुंशी प्रेमचंद से जुड़ी तमाम निशानियों को भी इसी उद्देश्य से सहेज कर रखा है।



प्रेमचंद के तीन दिवसीय जयंती महोत्सव के लिए  शासन ने चार लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति के साथ तीन लाख रुपये की राशि जारी कर दी है। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी के प्रमुख की ओर से इसका आशय का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। महोत्सव की तैयारियों में जुटे प्रधान संतोष कुमार ने बताया कि अभी जो काम हो रहे हैं, उन्हें ग्राम पंचायत निधि से कराया जा रहा है। प्रो. शुभ्रा मुखर्जी के नेतृत्व में गांव पहुंची काशी विद्यापीठ के मंच कला संकाय के छात्र-छात्राओं ने प्रेमचंद द्वारा रचित नाटक ‘धिक्कार’ के मंचन का रिहर्सल किया।

 
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