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बदलते वक्त के साथ बदल गए चुनाव प्रचार के तौर-तरीके, जानें कैसे
जयेंद्र चतुर्वेदी,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Tue, 14 Feb 2017 04:36 PM IST
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UP Election
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जीवन शैली में परिवर्तन के साथ-साथ टेक्नोलॉजी युग में चुनाव प्रचार के तरीके भी बदल गए हैं।
पहले के दिनों में चुनाव प्रचार में इक्के या रिक्शे से बंधे लाउड स्पीकर से पार्टी और प्रत्याशी के समर्थन में बैठकों से लेकर रैलियों की जानकारी देने के अलावा वादों और दावों की घोषणा भी की जाती थी।
डॉ. अनुराधा कहती हैं कि इक्के और रिक्शे पर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर बांधकर अपने प्रत्याशी के दावे और वायदों का प्रचार प्रसार उन्हें आज तक याद है। इनका इस्तेमाल तो अब इतिहास हो गया है।
यही नहीं, पहले उम्मीदवार झंडे, बैनर और पोस्टर का भी इस्तेमाल खूब करते थे।
नौंवे दशक से पूर्व सभी दल टिन से बने बिल्ले और बैज के जरिए पार्टी के चुनाव चिह्न और प्रत्याशी की फोटो मतदाताओं तक पहुंचाते थे।
सीमित यातायात साधनों के कारण पोस्टकार्ड पर हाथ से लिखी चिट्ठी के जरिए भी उम्मीदवार अपनी बात को मतदाताओं तक पहुंचाते थे। दीवार लेखन का चलन अभी भी है लेकिन ये केवल चुनाव की घोषणा से पहले तक ही होता है।
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आजादी के बाद के कई चुनाव में गीत-संगीत खासकर नुक्कड़ नाटक किए जाते थे।
इसके जरिए लोगों तक सीधे बात पहुंचानी आसान होती थी पर अब प्रचार में गीत संगीत और नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल नहीं होता। महारानी डिग्री कॉलेज के शिक्षाधिकारी अच्युत मिश्र बताते हैं कि गीत-संगीत, नुक्कड़ सभाओं के जरिए प्रत्याशी हर वोटर से मिलता था।
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पहले के दिनों में चुनाव प्रचार में इक्के या रिक्शे से बंधे लाउड स्पीकर से पार्टी और प्रत्याशी के समर्थन में बैठकों से लेकर रैलियों की जानकारी देने के अलावा वादों और दावों की घोषणा भी की जाती थी।
डॉ. अनुराधा कहती हैं कि इक्के और रिक्शे पर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर बांधकर अपने प्रत्याशी के दावे और वायदों का प्रचार प्रसार उन्हें आज तक याद है। इनका इस्तेमाल तो अब इतिहास हो गया है।
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यही नहीं, पहले उम्मीदवार झंडे, बैनर और पोस्टर का भी इस्तेमाल खूब करते थे।
नौंवे दशक से पूर्व सभी दल टिन से बने बिल्ले और बैज के जरिए पार्टी के चुनाव चिह्न और प्रत्याशी की फोटो मतदाताओं तक पहुंचाते थे।
सीमित यातायात साधनों के कारण पोस्टकार्ड पर हाथ से लिखी चिट्ठी के जरिए भी उम्मीदवार अपनी बात को मतदाताओं तक पहुंचाते थे। दीवार लेखन का चलन अभी भी है लेकिन ये केवल चुनाव की घोषणा से पहले तक ही होता है।
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आजादी के बाद के कई चुनाव में गीत-संगीत खासकर नुक्कड़ नाटक किए जाते थे।
इसके जरिए लोगों तक सीधे बात पहुंचानी आसान होती थी पर अब प्रचार में गीत संगीत और नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल नहीं होता। महारानी डिग्री कॉलेज के शिक्षाधिकारी अच्युत मिश्र बताते हैं कि गीत-संगीत, नुक्कड़ सभाओं के जरिए प्रत्याशी हर वोटर से मिलता था।
पं. नेहरू ने की थी 40 हजार किमी यात्रा
जवाहरलाल नेहरु
देश भर में यात्राएं करना चुनाव प्रचार का सशक्त माध्यम होता था।
पहले लोकसभा चुनाव के दौरान जवाहर लाल नेहरू ने देश में 40 हजार किलोमीटर की यात्रा की और 35 करोड़ से अधिक लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया।
पूर्व सैनिक सत्य नारायण यादव बताते हैं- ‘गांव के चौधरी बुलावा भेजते थे और पूरा गांव जुट जाता था। प्रत्याशी अपनी बात मंच पर खड़ा होकर करता था।’
पहले लोकसभा चुनाव के दौरान जवाहर लाल नेहरू ने देश में 40 हजार किलोमीटर की यात्रा की और 35 करोड़ से अधिक लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया।
पूर्व सैनिक सत्य नारायण यादव बताते हैं- ‘गांव के चौधरी बुलावा भेजते थे और पूरा गांव जुट जाता था। प्रत्याशी अपनी बात मंच पर खड़ा होकर करता था।’