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लोक मानस में प्रेम-उल्लास, उमंग से भरा है सावन का सुहाना संगीत: मनोज तिवारी

Thu, 03 Aug 2017 05:07 PM IST
amarujala.com, written by- अनूप ओझा
amarujala.com, written by- अनूप ओझा Updated Thu, 03 Aug 2017 05:07 PM IST
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manoj tiwari talks about the month of music sawan
सुपर स्टार मनोज तिवारी ‘मृदुल’ - फोटो : facebook
सावन जइसन छैल-छबीला महीना कउनो ना होखे ला। एकरा में जेतना नेह भरल बा ओतने हूक भी उठेला। पवन पुरवाई बहत होखे, जब बादर झिमिर- झिमर बरसत होखे, त अइसने में झंकिया से झांक-ताक के ननद-भौजाई दूनों के मन तरसे लागेला..। आंचर उड़े लागेला, काजर भींजे लागेला...जियरा बहके लागेला। लोक गीतों के राजकुमार कहे जाने वाले भोजपुरियावुड के सुपर स्टार मनोज तिवारी ‘मृदुल’ की नजरों में सावन का बिरह कैसा है? जरा इसे भी जान लीजिए। 
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मनोज तिवारी मृदुल के सुरों, लोक धुनों की दीवानगी यूपी-बिहार ही नहीं, मायानगरी के बॉलीवुड से राजधानी दिल्ली तक छाई है। मनोज बताते हैं कि मंगलवार की शाम संसद में आयोजित एक समारोह में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उनसे कजरी सुनने की इच्छा जताई।
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जब उन्होंने कइसे खेलन जइबू सावन में कजरिया/बदरिया घेरि आई ननदी... सुनाया तो लोक सभाध्यक्ष भाव विभोर हो उठीं। कजरी में सावन की घटाओं का सौंदर्य कर किसी को हुलास से भर देता है। मनोज कहते हैं कि सावन का संगीत प्रेम, उल्लाह से भरा पड़ा है।
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यूपी-बिहार के गांवों में कजरी, झूला के रूप में लोक संगीत की यह ऐसी बड़ी संपदा है, जिसे सहेज कर रखने की जरूरत है और इस दिशा में काम शुरू भी हो चुका है। वह भिखारी ठाकुर और महेंदर मिसिर जैसे भोजपुरी के महान गीतकारों को याद करते हुए कजरी पर सुर लगाते हैं- गावें बरसत होइहें बदरा/ओनकर भींजत होइहें कजरा/रहिया जोहत होइहें ना.. जब केहू करिहें हंसी-ठिठोली जियरा डोलत होइहें ना...।

मनोज बताते हैं कि इसी सावन में गोदनहारिने सुहागिनों की बाहों, गालों और हथेलियों पर प्यार की अमिट निशानी के रूप में गोदना गोदने के लिए निकलती थीं। कजरी में गोदना की एक बनागी देखिए-जान मारे तोहरे गाल पे गोदनवां ना..।

अरे गोदनवां ना हो गोदनवां ना...। गोदना गाल पे बा करिया/तोहके लागी ना नजरिया/ओह पे जुलुम करे पुरबी पवनवां ना...। मनोज भोजपुरी गीतकार हरेराम द्विवेदी हरी भैया की रचित कजरी खास तौर से गुनगुनाते हैं- चारों खूंटे घुमरी घुमावे हो रामा पवन पहुनवां/ अंचरा अकास उड़ावे हो रामा पवन पहुनवां...।

वह गांवों में सावनी फुहार के बीच गाई जाने वाली कजरी सुनाना नहीं भूलते- रिमझिम बुनियां में चढ़ली जवनियां/भींजत आवे धनियां रे गोइयां...। झिमिर -झिमिर बुनियां बहुतै सतावे रामा/उमड़ घुमड़ बदरा जियरा जरावे हो रामा...।


मनोज ने सावन की गीतों को नए जमाने के लटके -झटके के अंदाज में भी गाया है। उनके रोमांटिक सावनी गीत की एक बानगी इस तरह है- सावन के मस्त महीना हो/कोई शोख हसीना हो/रिमझिम बरसता पानी हो/पानी में पसीना हो...।  

 
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