पंचतत्व में विलीन हुए महामहोपाध्याय पं. रेवा प्रसाद द्विवेदी, पीएम मोदी सहित काशी के विद्वानों ने जताया शोक
काशी के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी साहित्य शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान थे। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है। उन्हें राष्ट्र के सबसे युवा साहित्यकार का राष्ट्रपति पुरस्कार 1979 में मिला था। पीएम मोदी ने पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी के निधन पर शोक जताया है।
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काशी के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी (90) का शुक्रवार की रात को निधन हो गया। शनिवार को हरिश्चंद्र घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके छोटे पुत्र प्रो. सदा शिव द्विवेदी ने मुखाग्नि दी। प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी के दो पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। हरिश्चंद्र घाट पर इस दौरान प्रो. भगवत शरण शुक्ल, प्रो. विजय शंकर शुक्ल, प्रो. रामनारायण द्विवेदी सहित अनेक विद्वान रहे।
महामहोपाध्याय पं. रेवा प्रसाद द्विवेदी के निधन की सूचना से काशी के विद्वानों में शोक की लहर है। काशी के विद्वानों का कहना है कि पंडित द्विवेदी के निधन से पांडित्य परंपरा की एक कड़ी टूट गई। पं. रेवा प्रसाद द्विवेदी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पूर्व संकाय प्रमुख रहे। साहित्य शास्त्र के साहित्य विभाग में विभागाध्यक्ष रहे।
पं. द्विवेदी स्वामी करपात्री जी के अनन्य शिष्यों में से थे। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि रेवा प्रसाद द्विवेदी साहित्य शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान थे। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है। इसमें तीन महाकाव्य अद्भुत हैं। शताब्दी का सबसे बड़ा महाकाव्य स्वातंत्र्यसंभव जो 103 सर्ग का है। आपने दो नाटक, 20 महाकाव्य और छह मौलिक साहित्य शास्त्र के ग्रंथों की रचना की।
प्रो. द्विवेदी 1950 में मध्य प्रदेश से काशी आए थे। उनका जन्म स्थान मध्य प्रदेश के सीहोर जिले का नांदेड गांव है। नवीन साहित्य शास्त्र की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. राम यत्न शुक्ल ने कहा कि आज प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी के जाने से संस्कृत का दैदीप्यमान नक्षत्र चला गया।
काशी विद्वत परिषद के महामंत्री राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि रेवा प्रसाद द्विवेदी ने जो काम किया है संस्कृत साहित्य के लिए वह आज के विद्वानों के लिए धरोहर है। अभिनव संस्कृत साहित्य स्थापना के लिए उन्होंने कार्य किया है अब वह कार्य अधूरा रह जाएगा। उनके जाने से क्षति हुई है भगवान उनके परिवार को इस शोक संवेदना सहन करने की क्षमता दे। पूरे काशी में संस्कृत जगत में एक शोक की लहर व्याप्त हो गई है।
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ये मिले सम्मान
प्रो. द्विवेदी को राष्ट्र के सबसे युवा साहित्यकार का राष्ट्रपति पुरस्कार 1979 में मिला था। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से विश्व भारती सम्मान, 1991 में साहित्य अकादमी सम्मान से भी विभूषित किया गया था। देश की तमाम संस्थाओं की ओर से उन्हें अनेक पुरस्कारों प्रदान किए गए हैं। सैकड़ों शोध पत्रों तथा शताधिक ग्रंथों का संपादन किया है। 90 छात्रों ने उनके मार्गदर्शन में शोध किए। पं. द्विवेदी को आधुनिक महाकवि कालिदास की उपाधि से अलंकृत किया गया था। काशी विद्वतपरिषद को उन्होंने बौद्धिक ऊंचाई दी।