काशी: 19 शिवलिंग के रूप में दर्शन देते हैं महादेव, अविमुक्तेश्वर दाहिने हाथ; त्रिलोचनेश्वर हैं नेत्र
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महादेव काशी में 19 शिवलिंग के रूप में दर्शन देते हैं। इनमें अविमुक्तेश्वर विश्वेश्वर को महादेव का दाहिना हाथ माना जाता है। त्रिलोचनेश्वर शिवलिंग उनके नेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आदिमहादेवेश्वर को महादेव की जटाएं कहा गया है।
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ॐकारेशः शिखा श्रेयः, लोचनानि त्रिलोचनः। गोकर्णभारभूतेशौ तत्कर्णौ परिकीर्तितौ। विश्वेश्वराविमुक्तौ च द्वावेतौ दक्षिणौ करौ। अर्थात अविमुक्तेश्वर और विश्वेश्वर भगवान शिव के दाहिने हाथ हैं। त्रिलोचन महादेव नेत्र हैं तो गोकर्णेश्वर दाहिन और भारभूतेश्वर महादेव बायां कान हैं। ओंकारेश्वर शिखा और आदिमहादेवेश्वर जटा के रूप में काशी में विराजमान हैं।
वहीं, चंद्रेश्वर हृदय और आत्मावीरेश्वर शिव की आत्मा हैं। करीब 19 अंग शिवलिंगों के रूप में दर्शन देते हैं। महादेव की नगरी काशी में भगवान शिव के गण चारों दिशाओं में देव और शिवलिंग स्वरूप में विराजमान हैं। पुराणों में इन गणों और शिवलिंगों की परिक्रमा यात्रा का विधान है।
अंतरगृही, पंचक्रोशी आदि यात्राओं के साथ ही भगवान शिव के अंगों की यात्रा निकलती है, जिसे ‘अंग यात्रा’ कहते हैं। स्कंद पुराण के काशी खंड में इसका भी वर्णन मिलता है। शिवजी के हर अंग के नाम पर शिवलिंग विराजमान हैं। मध्यमेश्वर महादेव को शिव की नाभि माना गया है। श्रुतीश्वर महादेव को सिर का आभूषण और कृत्तिवासेश्वर महादेव को सिर स्वरूप माना गया है।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि काशी में देवताओं का ध्यान कर पांच कदम भी चलने से तीर्थों में स्नान और दर्शन का फल मिलता है। काशी में भगवान शिव गणों और शिवलिंग स्वरूप में अलग-अलग स्थानों पर विराजमान होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। पुराणों में देवताओं की परिक्रमा करना अत्यंत शुभ और कल्याणकारी बताया गया है।
आत्मावीरेश्वर (आत्मा)
सिंधिया घाट के पास सिद्धेश्वरी गली में स्थित ‘आत्मावीरेश्वर’ (आत्मवीरेश्वर महादेव) में श्रीकाशी विश्वनाथ की आत्मा का वास माना जाता है। मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन से बाबा की आत्मा के दर्शन होते हैं। स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णित वीरेश्वर लिंग को ही आत्मावीरेश्वर कहा जाता है। पौराणिक कथा है कि ऋषि विश्वनार ने यहीं ‘अभिलाषाष्टकम’ का पाठ कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था।
निसंतान दंपतियों के लिए इसके दर्शन को फलदायी माना जाता है। माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद के माता-पिता ने यहां आकर प्रार्थना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद विवेकानंद का जन्म हुआ था। ऐसा भी माना जाता है कि जब मुख्य मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ था, तब भक्त इसी मंदिर में बाबा विश्वनाथ के दर्शन करते थे।
कृत्तिवासेश्वर (सिर)
कृत्तिवासेश्वर महादेव अति प्राचीन स्वरूपों में से एक हैं। हरतीरथ स्थित इस शिवलिंग का वर्णन स्कंद पुराण के ‘काशी खंड’ में है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने यहां गजासुर नामक राक्षस का वध किया था। राक्षस के अनुरोध पर शिव ने उसके चर्म को अपने वस्त्र के रूप में धारण किया, जिससे उनका नाम ‘कृत्तिवासेश्वर’ पड़ा। मान्यता है कि यह भगवान शिव का मस्तक या सिर है। यहां दर्शन और पूजन से संपूर्ण ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भारभूतेश्वर (बायां कान)
भारभूतेश्वर महादेव (भूतेश्वर या भूतीश्वर) को भगवान शिव के बाएं कान का प्रतीक माना गया है। स्कंद पुराण के काशी खंड में बताया गया है कि इस पवित्र शिवलिंग की स्थापना भगवान शिव के एक गण ‘भारभूत’ द्वारा की गई थी, इसलिए उनका नाम भारभूतेश्वर पड़ा। मान्यता है कि भारभूतेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के सुख, समृद्धि और शिवलोक की प्राप्ति होती है। यह मंदिर विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर राजादरवाजा में है।
विश्वेश्वर (दाहिना हाथ)
भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ‘विश्वेश्वर’ या ‘विश्वनाथ’ है। इन्हें भगवान शिव का दाहिना हाथ कहा गया है। यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। गंगा नदी के तट पर स्थित विश्व प्रसिद्ध श्रीकाशी विश्वनाथ को ब्रह्मांड का स्वामी कहा जाता है। ‘विश्वनाथ’ का अर्थ है ‘विश्व या ब्रह्मांड का स्वामी’। बाबा के दर्शन-पूजन और नाम जपने मात्र से ही भक्तों के पाप कट जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत को छोड़कर काशी में आकर बस गए।
अविमुक्तेश्वर (दाहिना हाथ)
अविमुक्तेश्वर को भी भगवान शिव का दाहिना हाथ माना गया है। यह स्वयंभू शिवलिंग है। अविमुक्त का मतलब है, जिसे कभी मुक्त न किया गया हो। पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव कभी काशी नहीं छोड़ते हैं। यह मंदिर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर परिसर क्षेत्र में स्थित है। कहा गया है कि पूरा विश्व काशी विश्वनाथ की पूजा करता है, जबकि स्वयं बाबा विश्वनाथ अविमुक्तेश्वर लिंग की पूजा करते हैं। इसलिए इन्हें काशी का प्रधान और प्राचीनतम लिंग माना जाता है। मान्यता है कि अविमुक्तेश्वर क्षेत्र में प्राण त्यागने वाले जीव को सीधे मोक्ष और शिवलोक की प्राप्ति होती है। गुप्तकाल से ही काशी में अविमुक्तेश्वर का स्थान सर्वोपरि था।
महाकालेश्वर (दाहिना चरण)
दारानगर क्षेत्र में मृत्युंजय महादेव मंदिर के पास महाकालेश्वर महादेव मंदिर है। पौराणिक ग्रंथों में इस शिवलिंग को भगवान शिव का दाहिना चरण माना गया है। मान्यता है कि यहां दर्शन और पूजन करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और महाकालेश्वर भक्तों को लंबी आयु का आशीष देते हैं।
धर्मेश्वर (बायां हाथ)
धर्मेश्वर महादेव भगवान शिव का बायां हाथ हैं। मीर घाट के पास यह मंदिर स्थित है। इस शिवलिंग को काशी के प्रमुख 42 मुक्तिलिंगों में गिना जाता है। ऐसी मान्यता है कि धर्मेश्वर महादेव के दर्शन और जलाभिषेक से भक्तों का अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है तथा नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। इस मंदिर के पास ही धर्मकूप है।
श्रुतीश्वर (शिरोभूषण)
दारानगर क्षेत्र में स्थित श्रुतीश्वर (श्रुतेश्वर) महादेव भगवान शिव के सिर के आभूषण स्वरूप में हैं। काशी खंड में इन्हें भगवान शिव के विभिन्न अंगों और आभूषणों का प्रतिनिधि बताया गया है। मान्यता है कि श्रुतीश्वर महादेव ज्ञान के प्रतीक हैं। इनकी पूजा करने से सुखमय जीवन और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कपर्दीश्वर (बायां चरण)
पिशाचमोचन कुंड के समीप स्थित कपर्दीश्वर महादेव को काशी खंड में ‘शिव अंग यात्रा’ के तहत भगवान शिव के बाएं चरण स्वरूप में विराजमान माना गया है। मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना भगवान शिव के प्रिय गण ‘कपर्दी’ ने की थी। कपर्दीश्वर महादेव के दर्शन से अकाल का भय नहीं रहता है।
शुक्रेश्वर महादेव
शुक्रेश्वर महादेव (शुक्रेश) श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर और माता अन्नपूर्णा मंदिर के पास कालिका गली में स्थित है। पौराणिक कथाओं में इस शिवलिंग और यहां स्थित ‘शुक्र कूप’ की स्थापना शुक्र ऋषि (शुक्र ग्रह के अधिष्ठाता) ने की थी।
सावन में सारंगनाथ में बाबा करते हैं प्रवास, मल्लिकार्जुन में विश्राम
काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। इसका अर्थ है कि भगवान शिव इस स्थान को कभी नहीं छोड़ते। वह अपने ज्योतिर्लिंग स्वरूप में सदैव काशी में विराजमान रहते हैं। मगर लोकमान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव पूरे साल काशी में अलग-अलग स्थानों पर भ्रमण भी करते हैं।
सावन में प्रतीकात्मक रूप से श्रीकाशी विश्वनाथ सारनाथ स्थित सारंगनाथ महादेव मंदिर में प्रवास करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सारंगनाथ माता पार्वती के भाई हैं। ऐसे में इसे बाबा का ससुराल भी माना जाता है। मान्यता है कि सावन में बाबा यहां आते हैं और यह उनका आत्मीय विश्राम स्थल है। वहीं, माघ में भगवान रामनगर में गंगा पार स्थित महर्षि वेदव्यास के मंदिर में जाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार, सिगरा के मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर में बाबा प्रतिदिन विश्राम करने जाते हैं। इसी तरह माता विशालाक्षी मंदिर में भी बाबा के प्रतीकात्मक विश्राम की मान्यता है। रंगभरी एकादशी पर भी लोकमान्यता के अनुसार बाबा की चल प्रतिमा की शोभायात्रा निकलती है और भक्तों को उनके दर्शन होते हैं।
पंचकोशी यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले विभिन्न पड़ावों पर भी भगवान शिव के प्रतीकात्मक प्रवास की मान्यता है। वहीं, मणिकर्णिका घाट को मोक्षस्थली माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां भगवान शिव सूक्ष्म रूप में उपस्थित होकर मृत्युपथ पर पहुंचे प्राणियों के कान में तारक मंत्र देते हैं और उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं।
अंतरगृही से पंचक्रोशी तक की परिक्रमा
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी नगरी की विभिन्न परिक्रमाएं की जाती हैं। केदारखंड, मध्यमेश्वर और ओंकारेश्वर—इन तीनों खंडों की अलग-अलग परिक्रमा होती है। इसे अंतरगृही परिक्रमा कहा जाता है। श्रद्धालु खंडवार परिक्रमा करते हैं और इन क्षेत्रों में विराजमान देवी-देवताओं का पूजन-अर्चन करते हैं। नगर अंतरगृही परिक्रमा ज्यादातर महिलाएं करती हैं। यह परिक्रमा मणिकर्णिका घाट से शुरू होकर अस्सी घाट, लहरतारा, मंडुवाडीह होते हुए वरुणा पुल तक जाती है और फिर वापस मणिकर्णिका घाट पर समाप्त होती है। वहीं, पूरी काशी की परिक्रमा को पंचक्रोशी परिक्रमा कहा जाता है। विभिन्न परिक्रमाएं सावन, मलमास और महाशिवरात्रि सहित अन्य महत्वपूर्ण तिथियों पर की जाती हैं।