वाराणसी: मां शीतला से हुई कोरोना महामारी को शांत करने की प्रार्थना
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धर्म नगरी काशी में शीतला अष्टमी पर घरों में सुबह से ही पूजन का सिलसिला आरंभ हो गया है। कहीं लोग गीत गाए जा रहे हैं तो कहीं घरों में माता को भोग लगाया गया। श्रद्धालुओं ने माता से विश्व में फैली महामारी को शांत करने की गुहार लगाई।
शनिवार को श्रद्धालुओं ने व्रत का संकल्प लेकर पूजन किया। माता को बासी भोजन का भोग अर्पित कर आरती उतारी। भोग के लिए मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल, भात लपसी आदि रात में ही बना लिए गए। रसोईघर की दीवार पर पांचो अंगुली घी में डुबोकर छापा लगाया गया और उस पर रोलीए चावल चढ़ाकर शीतलामाता के गीत गूंज उठे।
मेरी माता को चिनिये चौबारो, दूधपूत को चिनिये चौबारो। कौन ने मैया ईंटे थपाई, और कौन ने घोरौ है गारो। श्रीकृष्ण ने मैया ईंटे थपाई, दाऊजी घोरौ है गारौ। मेरी माताको चिनिये चौबारो।।
इसके बाद माता से समस्त महामारियों के साथ भक्तों के दुख, क्लेश और शोक को दूर करने की कामना की। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी, वैशाख, जेष्ठ और आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला अष्टमी पूजन करने का विधान है। इन चारों महीने के चार दिन का व्रत करने से शीतला जनित बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
शीतला मंदिर में नहीं मिला दर्शन :
शीतला अष्टïमी पर शनिवार को भी मां शीतला के दर्शन भक्तों को नहीं हुए। कोरोना संक्रमण को देखते हुए दशाश्वमेध घाट स्थित शीतला मंदिर को फिलहाल बंद रखा गया है। मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ने भक्तों से अपील की है कि वह घर पर ही शीतला अष्टïमी मनाएं। घर में धार, फूल और आरती करके माता से कोरोना को समाप्त करने की प्रार्थना करें। दर्शनार्थियों से आग्रह है कि वह शीतला माता का बसिअऊरा पूजन घर पर ही संपन्न करें।
शारीरिक और मानसिक रोग होते हैं दूर :
ऐसा माना जाता है कि शीतला माता भगवती दुर्गा का ही रूप है। भारतीय उपासना पद्धति जहां मनुष्य को आध्यात्मिक रूप से मजबूत करती है वहीं शारीरिक और मानसिक रोगों को दूर करने का भी इसका उद्देश्य होता है। कहा जाता है कि गर्मी के दिनों में शरीर में अनेक प्रकार के पित्त विकार भी प्रारंभ हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला अष्टमी का व्रत रखने से छोटी माता का प्रकोप नहीं होता। शीतला सप्तमी और शीतलाष्टमी व्रत मनुष्य को चेचक के रोगों से बचाने का प्राचीन काल से चला आ रहा व्रत है।
आयुर्वेद की भाषा में चेचक का ही नाम शीतला कहा गया है। अर्थात इस उपासना से शारीरिक शुद्ध, मानसिक पवित्रता और खान-पान की सावधानियों का संदेश मिलता
है।