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महारथियों के सुर-लय-ताल से बदली महोत्सव की फिजा
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 24 Dec 2016 02:27 AM IST
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तबला वादन करते पद्मश्री सुरेश तलवरकर।
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सुर-लय, ताल में महारत हासिल करने वाली संगीत जगत की तीन हस्तियों ने शुक्रवार की रात अपनी साधना से संस्कृति महोत्सव को परवान चढ़ाया। प्रसिद्ध ख्याल गायक उल्हास कसालकर ने जहां रागों की अलापचारी से संगीत प्रेमियों को मुग्ध किया, वहीं निलाद्री कुमार ने सितार के तारों पर स्वरों के प्रयोग पर खूब तालियां बटोरीं। वहीं पद्मश्री पं. सुरेश तलवरकर ने तबले पर ताल नाद की प्रस्तुति से चार चांद लगा दिया। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव की सातवीं निशा में इन कलाकारों को सुनने के लिए खचाखच भीड़ उमड़ी थी।
दीप प्रज्ज्वलन के बाद पं. उल्हास कसालकर ने अपने सुरों से महोत्सव को ऊंचाई दीं। उन्होेंने राग मारवा की अवतारणा की। बंदिश के बोल थे-‘...चैन न आवे ननदिया...। इसी राग में द्रुत लय की बंदिश-हे गुणिजन मिल गाओ बजाओ... सुनाकर रंग जमा दिया। फरमाइश पर उन्होंने राग पूर्वी में -मथुरा न जाइयो मोरा कान्हा..पेश कर संगीत प्रेमियों को रससिक्त किया। उनके साथ हारमोनियम पर श्यामा कुमार भारती, तबले पर पंडित सुरेश तलवलकर ने संगत की। गायन में साथ दिया ओजस प्रताप ने। इनके बाद पं. निलाद्री कुमार ने सितार पर राग रागेश्री की अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद उन्होंने गतकारी में स्वरों के समन्वय के साथ कई प्रयोग किए। दस मात्रा झप ताल के बाद तीन ताल में बंदिश बजाकर उन्होंने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राग तिलक कामोद में द्रुत लय की बंदिश बजाई।
अंत में झाला बजाकर समापन किश। अंत में पं. सुरेश तलवलकर ने तबला वादन से इस महोत्सव में रंग भरा। उन्होंने तीन ताल के अलावा रूपक ताल में कई प्रयोग किए। इससे पहले राहुल और रोहित मिश्र का गायन हुआ। राग मधुवंशी में ‘मोको नींद न आवे’ बड़ा ख्याल में गाया। छोटा ख्याल में ‘...गोविंद गुण गाओ सुनाया’। इसके बाद ठुमरी सुनाई, ...गोरी तोरे नैना काजल बिन काले सुनाया। पंडित धर्मनाथ मिश्र ने हारमोनियम, पंडित कुबेर नाथ ने तबला पर, अनीष मिश्र ने सारंगी पर और राम कृष्ण व शिवम मिश्र ने तानपुरा पर संगत किया।
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राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव के अंतर्गत स्वतंत्रता भवन में शुक्रवार को केदार शिंदे की मराठी नाट्यरचना ‘सही रे सही’ पर आधारित ‘राजू राजा राम और मैं’ नाटक का मंचन किया गया। अमीर ‘मदन सुखनंदानी’ के इर्द-गिर्द घूमते इस नाटक ने हास्य-व्यंग्य के साथ श्रोताओं को बड़ा संदेश दिया।
फिल्म अभिनेता शरमन जोशी इस नाटक में अलग-अलग चार भूमिकाओं में नजर आए। मदन सुखनंदानी की भूमिका के साथ ही उन्होंने गलगोले बनकर भी दर्शकों को खूब हंसाया। ‘मस्ती’, ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी से जिस तरह उन्होंने दर्शकों को लोटपोट किया, स्वतंत्रता भवन में मौजूद दर्शकों को भी कुछ वैसी ही गुदगुदाने वाली अदाकारी देखने को मिली।
उद्योगपति मदन सुखनंदानी को पता चलता है कि उसकी पत्नी और पीए में प्रेम संबंध है। इसके बाद उसकी गलती से ही पत्नी के हाथों उसकी हत्या हो जाती है। इसके बाद मदन सुखनंदानी की जायदाद में हिस्सेदारी के उनके कई रिश्तेदार सामने आ जाते हैं। सभी रिश्तेदार जायदाद अपने नाम करने के लिए अलग-अलग आदमी का इस्तेमाल करते हैं जिनकी शक्ल मदन सुखनंदानी से मिलती-जुलती है। इन्हीं के बीच ये पूरा नाटक घूमता है। इसमें हास्य और व्यंग का पूरा रंग देखने को मिलता है। नाटक में राजेश भोसले, राजेश दुबे, राजेश सिंह, मानसी, नम्या, प्रदीप और शिवानी ने इसमें अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।
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दीप प्रज्ज्वलन के बाद पं. उल्हास कसालकर ने अपने सुरों से महोत्सव को ऊंचाई दीं। उन्होेंने राग मारवा की अवतारणा की। बंदिश के बोल थे-‘...चैन न आवे ननदिया...। इसी राग में द्रुत लय की बंदिश-हे गुणिजन मिल गाओ बजाओ... सुनाकर रंग जमा दिया। फरमाइश पर उन्होंने राग पूर्वी में -मथुरा न जाइयो मोरा कान्हा..पेश कर संगीत प्रेमियों को रससिक्त किया। उनके साथ हारमोनियम पर श्यामा कुमार भारती, तबले पर पंडित सुरेश तलवलकर ने संगत की। गायन में साथ दिया ओजस प्रताप ने। इनके बाद पं. निलाद्री कुमार ने सितार पर राग रागेश्री की अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद उन्होंने गतकारी में स्वरों के समन्वय के साथ कई प्रयोग किए। दस मात्रा झप ताल के बाद तीन ताल में बंदिश बजाकर उन्होंने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राग तिलक कामोद में द्रुत लय की बंदिश बजाई।
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अंत में झाला बजाकर समापन किश। अंत में पं. सुरेश तलवलकर ने तबला वादन से इस महोत्सव में रंग भरा। उन्होंने तीन ताल के अलावा रूपक ताल में कई प्रयोग किए। इससे पहले राहुल और रोहित मिश्र का गायन हुआ। राग मधुवंशी में ‘मोको नींद न आवे’ बड़ा ख्याल में गाया। छोटा ख्याल में ‘...गोविंद गुण गाओ सुनाया’। इसके बाद ठुमरी सुनाई, ...गोरी तोरे नैना काजल बिन काले सुनाया। पंडित धर्मनाथ मिश्र ने हारमोनियम, पंडित कुबेर नाथ ने तबला पर, अनीष मिश्र ने सारंगी पर और राम कृष्ण व शिवम मिश्र ने तानपुरा पर संगत किया।
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राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव के अंतर्गत स्वतंत्रता भवन में शुक्रवार को केदार शिंदे की मराठी नाट्यरचना ‘सही रे सही’ पर आधारित ‘राजू राजा राम और मैं’ नाटक का मंचन किया गया। अमीर ‘मदन सुखनंदानी’ के इर्द-गिर्द घूमते इस नाटक ने हास्य-व्यंग्य के साथ श्रोताओं को बड़ा संदेश दिया।
फिल्म अभिनेता शरमन जोशी इस नाटक में अलग-अलग चार भूमिकाओं में नजर आए। मदन सुखनंदानी की भूमिका के साथ ही उन्होंने गलगोले बनकर भी दर्शकों को खूब हंसाया। ‘मस्ती’, ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी से जिस तरह उन्होंने दर्शकों को लोटपोट किया, स्वतंत्रता भवन में मौजूद दर्शकों को भी कुछ वैसी ही गुदगुदाने वाली अदाकारी देखने को मिली।
उद्योगपति मदन सुखनंदानी को पता चलता है कि उसकी पत्नी और पीए में प्रेम संबंध है। इसके बाद उसकी गलती से ही पत्नी के हाथों उसकी हत्या हो जाती है। इसके बाद मदन सुखनंदानी की जायदाद में हिस्सेदारी के उनके कई रिश्तेदार सामने आ जाते हैं। सभी रिश्तेदार जायदाद अपने नाम करने के लिए अलग-अलग आदमी का इस्तेमाल करते हैं जिनकी शक्ल मदन सुखनंदानी से मिलती-जुलती है। इन्हीं के बीच ये पूरा नाटक घूमता है। इसमें हास्य और व्यंग का पूरा रंग देखने को मिलता है। नाटक में राजेश भोसले, राजेश दुबे, राजेश सिंह, मानसी, नम्या, प्रदीप और शिवानी ने इसमें अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।