वाराणसी: गुरुओं की आत्मा की शांति के लिए किन्नरों ने किया त्रिपिंडी श्राद्ध ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का किया तर्पण
गया तीर्थ के समान फलदाई वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड पर गुरुओं की आत्मा की शांति के लिए किन्नरों ने बुधवार को त्रिपिंडी श्राद्ध किया। किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के साथ पहुंचे किन्नरों के दल ने अपने गुरुओं के साथ ही ज्ञात-अज्ञात पितरों का भी तर्पण किया।
मोक्षदायिनी काशी में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी देशभर के किन्नरों ने कोरोना काल के बीच किन्नर अखाड़ा के नेतृत्व में पितरों को नमन किया। इस दौरान कौशल्या नंदन गिरि, देवी पवित्रा, कामिनी माई सहित कई गुरु मौजूद रहे।
महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि जितनी भी आत्माएं हमारा साथ छोड़कर परमधाम चली गईं हैं, उन सभी के लिए आज त्रिपिंडी श्राद्ध किया गया। 2019 से जब मैंने किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर का पद ग्रहण किया तो मुझे लगा कि धर्म के अनुसार श्राद्ध करना चाहिए।
शिखंडी ने शुरू की थी परंपरा
महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि इतिहास में पहली बार महाभारत काल में शिखंडी ने पिंडदान कर यह नई परंपरा शुरू की थी। सैकड़ों वर्षों के बाद किन्नरों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान कर पिछले चार सालों से परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है।