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बनारस में काशी उत्सव का रंगारंग आगाज: कुमार विश्वास ने सुनाई कविताएं तो युवाओं ने मिलाई आवाज,रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में उमड़ी भीड़

Tue, 16 Nov 2021 11:26 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Tue, 16 Nov 2021 11:26 PM IST
सार

युवाओं के दिल की धड़कन कवि कुमार विश्वास मंगलवार को वाराणसी पहुंचे। तीन दिवसीय काशी उत्सव की पहली शाम की महफिल उनके नाम रही। 

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Kashi utsav in Banaras youth mixed voice when Kumar Vishwas sung poems in varanasi Rudraksh Convention Center
काशी उत्सव में कुमार विश्वास - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वाराणसी में आयोजित तीन दिवसीय काशी उत्सव की पहली शाम की महफिल को कवि कुमार विश्वास ने अपनी कविता और तरानों के दम पर लूट लिया। रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में अब तक होने वाले कार्यक्रम में सबसे अधिक भीड़ मंगलवार को दिखी। यहां सभागार खचाखच भरा रहा। कुछ लोगों ने खड़े होकर कुमार विश्वास की कविता को पूरे उत्साह के साथ सुना। कुमार ने एक के बाद एक कविता और गीत की प्रस्तुति से काशी उत्सव के पहले दिन की शाम की महफिल लूट ली। 

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कुमार विश्वास ने अपने कार्यक्रम की शुरूआत 'ये गंगा का किनारा है' गीत के माध्यम से गंगा निर्मलीकरण की ओर सभी का ध्यान आकृष्ट करते हुए गंगा की महत्ता को भी दर्शाया। इसके बाद देश वंदना में जयशंकर प्रसाद के गीत 'अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंचे अनजान क्षितिज को, मिलता एक सहारा'  की प्रस्तुति से जयशंकर प्रसाद को याद किया।
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भारत माता के जयकारे से गूंज उठा सभागार
इसके बाद 'क्या कहती हो ठहरो नारी, संकल्प अश्रु जल से अपने, तू दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने से सपने' गीत को गाया तो लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। इस गीत के माध्यम से कुमार विश्वास ने नारी सशक्तिकरण की ओर सभी का ध्यान खींचा। कार्यक्रम की कड़ी में ही भारत का पहला प्रयाण गीत 'बढ़े चलो-बढ़े चलो' की जैसे ही शुरुआत की तो भारत माता के जयकारे से रुदाक्ष कन्वेंशन सेंटर का सभागार गूंज उठा।
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इसके बाद कुमार विश्वास ने इस 'करुणा कलित हृदय में, अविकल रागिनी बजती है' को भी सुनाया।  इससे पहले कार्यक्रम के शुभारंभ में आजादी के अमृत महोत्सव के तहत होने वाले कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया गया। कार्यक्रम में प्रदेश के पर्यटन मंत्री डॉ.नीलकंठ तिवारी, रोहित सिंह, अतिरिक्त सचिव संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के साथ ही पद्मश्री पंडित राजेश्वर आचार्य, सच्चिदानंज जोशी सहित अन्य लोग मौजूद रहे। 

काशी में दिखता है पूरा विदेश

Kashi utsav in Banaras youth mixed voice when Kumar Vishwas sung poems in varanasi Rudraksh Convention Center
रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर का सभागार - फोटो : अमर उजाला

कुमार विश्वास ने अपने कार्यक्रम के बीच-बीच में काशी की खासियत को भी बताया। कहा कि काशी में पूरा विदेश देखता है। यहां पता नहीं क्यों लोग केवल यहां सड़कों को देखते हैं। काशी को देखना है तो यहां की गलियों को देखना होगा। गलियों से ही देखने पर इसकी खासियत का पता चलता है।

बनारस में कुछ भी कहा जाए, यह कम होता है। यहां मंच पर आने के लिए मंत्री होना जरूरी नहीं है। कला की पहचान होती है। यह वही काशी है, जहां का मरना भी मंगल होता है। ऐसी काशी बहुत नसीब वालों को मिलती है। काशी में मराठी भाषियों का भी बहुत जुड़ाव रहा है। कवि सुब्रमहणयम भारती ने यहीं चार साल तक प्रवास किया है। 

समृद्ध विरासत से अवगत कराना ही काशी उत्सव का उद्देश्य

केंद्रीय संस्कृति राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने अपने भाषण की शुरूआत भोजपुरी से की। कहा कि  इहा सभागार में उपस्थित सब लोगन के गोड़ लागत बाड़ी।  प्रणाम बाड़ी। हर हर महादेव के जयघोष से भी गूंज उठा। अन्नपूर्णा देवी की भी जयकारे लगे।

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि काशी नगरी का जो उत्सव मनाया जा रहा है, वह अविस्मरणीय है। काशी का जीवन ऐसा है जिसने लोक संगीत, वेदों पर टिप्पणी, ज्ञान विज्ञान यंत्र पर सब पर काम हुआ है। काशी में तीन दिवसीय उत्सव का उद्देश्य लोगों को समृद्ध विरासत से अवगत कराना है। 
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तीन दिवसीय उत्सव में दिखेगी काशी की विरासत 

संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से तीन दिवसीय काशी उत्सव का आगाज मंगलवार को रूद्राक्ष कनवेंशन सेंटर में किया गया। इस मौके पर पुस्तक विमोचन के अलावा साहित्यकारों की कृतियों पर चर्चा हुई। भारतीय स्वतन्त्रता के 75वें वर्ष में अमृत महोत्सव का विविध यात्राओं के साथ भारत की सांस्कृतिक राजधानी में काशी उत्सव में आयोजित किया गया।

आयोजन के प्रथम सत्र में प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी की पुस्तक काशी की प्राचीन देवमूर्तियां विमोचन हुआ। इस मौके पर काशी के हस्ताक्षर भारतेन्दु हरिश्चंद्र एवं जयशंकर प्रसाद का हिंदी साहित्य को अवदान, राष्ट्रवाद की संकल्पना विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।

परिचर्चा में वीरेन्द्र मिश्र ने कहा कि काशी की होली भी मसाने की होती है और दीपावली भी देवों की ही होती है। प्रोफेसर निरंजन कुमार ने कहा कि भक्ति में डूबी तुलसी की काशी है, जो कबीर की फक्कड़ता में जीवन जीती है। सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि काशी के प्रत्येक रंग का, इसकी अभूतपूर्व कला साधना से युवा के मस्तिष्क में उनकी मौलिकता से परिचय कराना आयोजन का लक्ष्य है। 

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