{"_id":"5a0d634d4f1c1bd8538bd732","slug":"jal-tarang-music-out-of-date-today","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"जल तरंग की गूंज पर ठहर जाता है वक्त, इस वाद्य में है पंचतत्वों का समन्वय ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जल तरंग की गूंज पर ठहर जाता है वक्त, इस वाद्य में है पंचतत्वों का समन्वय
amarujala.com- Written by: अनूप ओझा
Updated Thu, 16 Nov 2017 03:37 PM IST
विज्ञापन
बनारस में इस प्राचीन वाद्य यंत्र के इकलौते साधक डॉ. राजेश्वर आचार्य
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना सुर-साज का वो गुलदस्ता है जिसकी लय-ताल की खुशबू का हर कोई दीवाना है। संगीत के शहर बनारस को ताल-नाद के एक युग के सूत्रपात के लिए जाना जाता है। तबले में खड़ी उंगली की ‘बनारस बाज’ शैली इसी घराने से निकली। यहां कबीरचौरा, रामापुरा की गलियों में जहां सुबह-शाम ना धिं धिं ना... के बोल गूंजते हैं, वहीं पखावज, मृदंग, सितार, सुर बहार, सारंगी, बांसुरी, वीणा, गिटार और लुप्तप्राय जल तरंग के स्वर भी खनकते हैं। आइए आपका परिचय कराते हैं बनारस घराने के ताल-नाद की कुछ खूबियों और उनके साधकों से। संगीत के इस अनूठे सफर की शुरुआत करते हैं ‘जल तरंग’ से। बनारस में इस प्राचीन वाद्य यंत्र के इकलौते साधक डॉ. राजेश्वर आचार्य की कुछ बंदिशों के साथ...।
सम्मोहित करती प्यालों पर लय-ताल की खनक
चीनी मिट्टी के प्यालों पर बेंत की छड़ी के सहारे रागों की अवतारणा कितनी कठिन होगी, इसका अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है। इन प्यालों पर आलाप भी बजता है, जोड़ भी। फिरकी की तरह नाचती स्टिक पर झाला की गूंज पर तो वक्त ठहर जाता है। प्यालों के स्वर और स्टिक के नाद के समन्वय का तो कोई जोड़ नहीं। डॉ. राजेश्वर आचार्य जब इस वाद्य पर रागों की अवतारणा करते हैं तो वह डूब जाते हैं। फिर साज और उनके बीच कोई नहीं होता।
भदैनी स्थित आवास पर जल तरंग की साधना के कुछ यादगार लम्हे संजोए गए। दोपहर से ही डॉ. आचार्य जल तरंग के प्याले मिलाने बैठ गए थे। शिष्यों ने प्याले सजाए। कभी उन प्यालों में जल भरा जाता रहा तो कभी उनकी मात्रा घटाई, बढ़ाई जाती रही। जल की मात्रा के साथ स्टिक से स्वरों का वे लगातार मिलान करते रहे। किसी प्याले में पानी कम होता और किसी में ज्यादा तो स्वरों के मिलान में कठिनाई भी आती रही।
विज्ञापन
करीब तीन घंटे की मेहनत के बाद सही स्वर लगे तो उनके चेहरे पर चमक सी दौड़ गई। उन्होंने स्वरचित राग वाचस्पति की अवतारणा की। आलाप, जोड़ के बाद जब उन्होंने तीन ताल द्रुत लय में झाला बजाना शुरू किया तो स्वर, लय, ताल एकाकार हो गए। फिर उन्होंने दादरा ताल में एक धुन बजाई। वह बताते हैं कि इस वाद्य में पंचतत्वों का समन्वय होता है। उच्चताप पर पकाए गए प्यालों से ही स्वर निकलते हैं। इसलिए इसे बजाने के लिए साधक को भी तपना पड़ता है।
विज्ञापन
सम्मोहित करती प्यालों पर लय-ताल की खनक
चीनी मिट्टी के प्यालों पर बेंत की छड़ी के सहारे रागों की अवतारणा कितनी कठिन होगी, इसका अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है। इन प्यालों पर आलाप भी बजता है, जोड़ भी। फिरकी की तरह नाचती स्टिक पर झाला की गूंज पर तो वक्त ठहर जाता है। प्यालों के स्वर और स्टिक के नाद के समन्वय का तो कोई जोड़ नहीं। डॉ. राजेश्वर आचार्य जब इस वाद्य पर रागों की अवतारणा करते हैं तो वह डूब जाते हैं। फिर साज और उनके बीच कोई नहीं होता।
विज्ञापन
भदैनी स्थित आवास पर जल तरंग की साधना के कुछ यादगार लम्हे संजोए गए। दोपहर से ही डॉ. आचार्य जल तरंग के प्याले मिलाने बैठ गए थे। शिष्यों ने प्याले सजाए। कभी उन प्यालों में जल भरा जाता रहा तो कभी उनकी मात्रा घटाई, बढ़ाई जाती रही। जल की मात्रा के साथ स्टिक से स्वरों का वे लगातार मिलान करते रहे। किसी प्याले में पानी कम होता और किसी में ज्यादा तो स्वरों के मिलान में कठिनाई भी आती रही।
विज्ञापन
करीब तीन घंटे की मेहनत के बाद सही स्वर लगे तो उनके चेहरे पर चमक सी दौड़ गई। उन्होंने स्वरचित राग वाचस्पति की अवतारणा की। आलाप, जोड़ के बाद जब उन्होंने तीन ताल द्रुत लय में झाला बजाना शुरू किया तो स्वर, लय, ताल एकाकार हो गए। फिर उन्होंने दादरा ताल में एक धुन बजाई। वह बताते हैं कि इस वाद्य में पंचतत्वों का समन्वय होता है। उच्चताप पर पकाए गए प्यालों से ही स्वर निकलते हैं। इसलिए इसे बजाने के लिए साधक को भी तपना पड़ता है।
...तो गुजरे जमाने का साज बन जाएगा जल तरंग
बनारस में इस प्राचीन वाद्य यंत्र के इकलौते साधक डॉ. राजेश्वर आचार्य
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. राजेश्वर आचार्य जल तरंग बजाने वाले बनारस के इकलौते कलाकार हैं। देश भर में इस वाद्य की साधना करने वाले गिनती के कलाकार रह गए हैं। इस वाद्य को संरक्षण न मिलने से इसकी लय टूटने का खतरा मंडरा रहा है। ताल-नाद के रूप में जल तरंग प्राकृत वाद्य है। हर प्याले की अपनी आवाज होती है और हर प्याले में पानी की निर्धारित मात्रा। इसी से स्वरों के सम का निर्धारण होता है। वह इस वाद्य यंत्र की उपेक्षा से बेहद नाराज दिखे।
उनका कहना है कि संसाधन नदारद हैं। एक तरफ जहां सरकार संगीत-कला के आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं इसके लिए एक सेट प्याले तक नहीं हैं। कोलकाता में एक कार्यक्रम में जल तरंग बजाने के लिए बहुत आग्रह किया गया तो लखनऊ से 17 पुराने प्याले 25 हजार रुपये में मंगाए गए। नई पीढ़ी में इस वाद्य यंत्र को सीखने वाले भी नहीं हैं। यही हाल रहा तो जल तरंग गुजरे जमाने की चीज हो जाएगा।
यह है जल तरंग
- वेदों में वोदक वाद्य के रूप में इसका उल्लेख है।
- 21 प्याले कतारबद्ध सजाए जाते हैं। इन्हीं प्यालों के बीच सप्तक निहित होता है।
- बेंत या बांस की छड़ी के सहारे प्यालों पर स्वरों की होती है अवतारणा
नामचीन कलाकार
केएल सूद, घासी राम, डॉ. लालमणि मिश्र, पं. बलवंत राय भावरंग इस वाद्ययंत्र के प्रसिद्ध साधक रहे हैं। पुणे में मिलिंद तुलंकर कर रहे हैं जल तरंग की साधना।
उनका कहना है कि संसाधन नदारद हैं। एक तरफ जहां सरकार संगीत-कला के आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं इसके लिए एक सेट प्याले तक नहीं हैं। कोलकाता में एक कार्यक्रम में जल तरंग बजाने के लिए बहुत आग्रह किया गया तो लखनऊ से 17 पुराने प्याले 25 हजार रुपये में मंगाए गए। नई पीढ़ी में इस वाद्य यंत्र को सीखने वाले भी नहीं हैं। यही हाल रहा तो जल तरंग गुजरे जमाने की चीज हो जाएगा।
यह है जल तरंग
- वेदों में वोदक वाद्य के रूप में इसका उल्लेख है।
- 21 प्याले कतारबद्ध सजाए जाते हैं। इन्हीं प्यालों के बीच सप्तक निहित होता है।
- बेंत या बांस की छड़ी के सहारे प्यालों पर स्वरों की होती है अवतारणा
नामचीन कलाकार
केएल सूद, घासी राम, डॉ. लालमणि मिश्र, पं. बलवंत राय भावरंग इस वाद्ययंत्र के प्रसिद्ध साधक रहे हैं। पुणे में मिलिंद तुलंकर कर रहे हैं जल तरंग की साधना।