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शिव की प्रेरणा से रची थी कामायनी, आज है महाकवि जयशंकर प्रसाद की जयंती

Sat, 30 Jan 2021 01:10 AM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sat, 30 Jan 2021 01:10 AM IST
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Jaishankar Prasad jayanti Kamayani was inspired by Shiva
महाकवि जयशंकर प्रसाद

कालजयी रचना कामायनी की रचना महाकवि जयशंकर प्रसाद ने गोवर्धनसराय स्थित शिवालय में ही लिखी थी। महाकवि ने जीवन के आखिरी दिनों में इस महाकाव्य की रचना की थी। कामायनी को अद्भुत शास्त्र कहा जाता है। ज्ञान, भाव और कर्म की बुनियाद पर लिखे इस महाकाव्य में मानव के देवत्व पर श्रेष्ठता की उद्घोषणा का भी संकेत मिलता है। 

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शोधकर्ता व वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि कालजयी रचना कामायनी प्रसाद भवन गोवर्धनसराय स्थित शिवालय में रची गई थी। इस शिवालय का निर्माण जयशंकर प्रसाद के पितामह स्व. शिवरत्न साहू ने कराया था। कह सकते हैं कि शिव जी के प्रेरणा से ही कामायनी लिखी गई। यह मंदिर काफी पुराना व जीर्ण हो गया था। इसी साल उनके प्रपौत्र भवरत्न ने शिवालय का जीर्णोद्धार कराया है। साल 1936 में प्रकाशित हुए इस महाकाव्य में प्रसाद ने प्रथम मानव मनु के माध्यम से तकरीबन संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का विस्तृत व्याख्यान लिखा है। यूनेस्को जैसी संस्था ने उनकी महान कृति कामायनी का अनुवाद तमाम अन्तरराष्ट्रीय भाषाओं मे करा चुकी है। कामायनी को भारत के प्रतिनिधि काव्य के रूप में यूनेस्को ने अंगीकार किया है।

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काशी विद्यापीठ के प्रो. श्रद्धानंद ने बताया कि कुल 15 सर्गों वाली कामायनी का हर सर्ग किसी स्थान, घटना या पात्र के नाम के शीर्षक के साथ आरंभ होने की बजाय मानव मन की वृत्तियों के आधार पर होती है। हिंदी साहित्य में उनके पूर्ववर्ती भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी गद्य को खड़ी बोली से समृद्ध तो किया लेकिन पद्य में वह ब्रज भाषा में ही लेखन करते थे। बहुत लंबे समय तक हिंदी खड़ी बोली का हिंदी काव्य से साक्षात्कार नहीं हुआ था। हिंदी का यह इंतजार तब खत्म हुआ जब जयशंकर प्रसाद ने आंसू की रचना की। इसे हिंदी पद्य साहित्य का पहला ऐसा काव्य संग्रह माना जाता है जो खड़ी बोली हिंदी में लिखी गई है लेकिन जयशंकर प्रसाद को हिंदी साहित्य के इतिहास में इस युगांतकारी परिवर्तन के अलावा भी कई कारणों से याद किया जाता रहा है। इन्हीं में से एक कारण है कामायनी।

ठुकरा दी थी मुंशी प्रेमचंद की पैरवी

मोहल्ले के रहने वाले हाजी फरमान हैदर ने बताया कि साहित्यिक जीवन से इतर प्रसाद का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही सरल था। प्रसाद बड़े ही सामाजिक थे लेकिन गोष्ठियों, समारोहों में भाग लेने से कतराते थे। साहित्य की लगभग हर विधा नाटक, उपन्यास, कविता, निबंध और गजल इत्यादि में हाथ आजमाने वाले प्रसाद किसी की भी पुस्तक की भूमिका लिखने में बिल्कुल रूचि नहीं रखते थे। उन्हाेंने तो उपन्यास सम्राट प्रेमचंद तक की पैरवी को ठुकरा दिया था। 

अधूरा रह गया उपन्यास

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महाकवि का अंतिम उपन्यास इरावती उनके असामयिक निधन के चलते अधूरा रह गया। 15 नवंबर 1937 को उनका निधन हो गया था। अल्प जीवनकाल में ही जयशंकर प्रसाद ने जो कुछ भी हिंदी साहित्य को सौंपा, वह उनकी अखंड, अजर और अमर कीर्ति का प्रमाणपत्र है। उनकी कृति कामायनी विश्व साहित्य की सदी की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। श्यामनारायण पांडेय ने इसे विश्व साहित्य का 8वां महाकाव्य घोषित किया है। वहीं सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने कामायनी को हिंदी के ताजमहल की संज्ञा दी थी।

भोर में चमका सितारा और भोर में ही हुआ अस्त

जयशंकर प्रसाद पर शोध कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि महाकवि का जन्म 30 जनवरी 1890 को प्रसाद मंदिर गोवर्धन सराय में सुबह चार बजे हुआ था। उनका निधन 15 नवंबर 1937 को ठीक चार बजे भोर में हुआ था। ऐसा संयोग बहुत कम मिलता है जब किसी महापुरुष का जन्म और मृत्यु एक ही समय पर हुई हो।

आयकर देते थे जयशंकर प्रसाद 

जयशंकर प्रसाद का जन्म एक धनी और संपन्न परिवार में हुआ था। पूर्वजों की प्रतिष्ठित परंपरा सुंघनी साहू के नाम से विख्यात है। जयशंकर प्रसाद के पौत्र किरणशंकर और प्रपौत्र भवरत्न आज भी उनकी आयकर विवरणी को सहेज कर रखा है। इसमें सन1934, 1935 और 1936 के आयकर के विवरण के दस्तावेज हैं।

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