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International Women's Day: नाजुक कदमों और चट्टान जैसे इरादे के सहारे समाज के लिए मिसाल बनीं ये स्त्री शक्ति 

Tue, 08 Mar 2022 01:26 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Tue, 08 Mar 2022 01:26 PM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को मनाया जाता है। जो महिलाओं के सम्मान, साहस और शक्ति को समर्पित दिन होता है। यह दिन समाज में महिला सशक्तिकरण, जागरुकता और समान अधिकार को बढ़ावा देने की याद भी दिलाता है।

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International Womens Day these lady power from varanasi became example for society With help of  rock like intention
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पिछले कुछ वर्षों में आधी आबादी में जबरदस्त बदलाव देखेने को मिला है। उन्होंने ख्वाब देखे तो उसमें रंग भी भरे। कला, कानून, फैशन, खेल, टेक्नोलॉजी मेडिकल, पुलिस, शिक्षा, समेत हर क्षेत्र में आधी आबादी का दखल बढ़ा है। काशी में महिलाओं ने जान लिया है कि जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है। महिला दिवस पर हम कुछ ऐसी ही स्त्री शक्ति से रूबरू होंगे जिनके लिए हालात विपरीत थे, लेकिन वो संघर्ष को तैयार थीं। नाजुक कदमों और चट्टान जैसे इरादे के सहारे ये समाज के लिए मिसाल बन गई हैं। पढ़ें पूजा सिंह की रिपोर्ट

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मां-बाप बन निभाई वर्दी की जिम्मेदारी
14 साल पहले हार्ट अटैक के चलते पति का देहांत हो गया। उस समय ऐसा लगा कि ऊपर वाले ने पता नहीं कौन से अपराध का बदला लिया है, मेरे साथ ऐसा हुआ। दो बच्चों का चेहरा देखकर सुबक ती थी कि अब जाने कैसे गुजरेगी जिंदगी। बच्चों को पढ़ाना और उनकी परवरिश किसी चुनौती से कम नहीं लगती थी।
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लेकिन इन मुश्किल वक्त में भी महिला थाना की प्रभारी सुमित्रा देवी ने खुद को टूटने नहीं दिया। बच्चों को अच्छी परवरिश देने के साथ ही पुलिस की नौकरी ज्वाइन की। वर्दी का फर्ज निभाने के साथ उन्होंने एक मां और बाप दोनों की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। महिला थाना का प्रभारी बनने के बाद सुमित्रा अपनी काउसिंलिंग के जरिये न जाने कितने बिखरते रिश्तों को जोड़ा है।
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यहीं नहीं वर्दी का फर्ज निभाने के दौरान कई बड़े अपराध का खुलासा भी किया। जब भी किसी महिला, युवती या बच्ची को उनकी जरूरत होती है, वो उनके साथ खड़ी होती है। सुमित्रा कहती है मेरे लिए मेरी खाकी मेरा अभिमान है। वर्दी की जिम्मेदारियां हर हाल में, हर कीमत पर सबसे पहले हैं, यह शपथ उसी दिन ली थी जब 2010 बैच में मेरा चयन हुआ।

नौकरी छोड़ थामा जरूरतमंद महिलाओं का हाथ

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प्रियंका मिश्रा - फोटो : अमर उजाला

मुंबई में बड़ी कंपनी की नौकरी छोड़ दी, क्योंकि जिम्मेदारियां निभाने में उन्हें बंधन मंजूर नहीं था। इसके बाद चुना डेवलपमेंट सेक्टर को, जहां ग्रामीण महिलाओं को हुनर और रोजगार देकर उनका जीवन संवारने का जिम्मा उठाया। ग्रामीण महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहीं हैं। इस शख्सियत का नाम है प्रियंका मिश्रा।

जो होप वेलफेयर ट्रस्ट में एक अहम जिम्मेदारी पूरी कर रही है। प्रियंका वाराणसी, मिर्जापुर, सहित आसपास के कुछ जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों के महिलाओं को सिलाई कढ़ाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें खुद के पैरों पर खड़ा होने का हौसला दे रही हैं। प्रियंका कहती हैं, दूसरों के जीवन में आत्मनिर्भरता देकर जो सुकून मिलता है वो किसी कंपनी में नौकरी करने में नहीं मिलता।

होप संस्था की ओर से महिलाओं को दिए जा रहे प्रशिक्षण से ग्रामीण क्षेत्र की युवतियों व महिलाएं भी अपने जीवन को निखार रहीं है। हुनर पाकर ये शहर ही नहीं गांव में भी बुटिक का व्यापार चला रही हैं। संस्था अब तक एक हजार युवतियों को निशुल्क टेलरिंग का प्रशिक्षण दे चुकी है। प्रियंका बताती हैं, जब भी एक छात्रा या महिला उनके यहां से कार्य सीखकर जाती है अपना रोजगार शुरू करती है तो बहुत खुशी होती है।

कठिन डगर पर नहीं टूटा हौसला

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अपने परिवार के साथ निधि (सबसे दायें) - फोटो : अमर उजाला

पिता ऑटो चालक, मां 8वीं पास, लेकिन बेटी ने आईआईटीयन बनकर परिवार का नाम रौशन कर दिया। निधि का परिवार आज भी दशाश्वमेध स्थित दूध सट्टी में रहता है। एक दौर था जब निधि के दादा साइकिल पर नमकीन बेचते और चाचा ड्राइवरी करते थे। इन सबके 15-18 घंटे की मेहनत के बावजूद 12 सदस्यों के परिवार का भरण-पोषण मुश्किल था।

ब्राह्मण होने के नाते परिवार को मंदिर के प्रांगण में रहने की जगह मिल गई थी। चार बहनों और भाई के पिता सुनील झा की आंखों में बस यही सपना था कि बच्चे उनकी तरह संघर्षों से दूर रहे। उनके इस सपने को साकार करने के लिए निधि ने जीतोड़ मेहनत की और 10वीं और 12वीं पास किया। लेकिन निधि का सपना आईआईटी क्रैक करने का था, इसकी तैयारी करने को लेकर उनके पास किताब खरीदने को पैसे नहीं थे। लेकिन निधि ने दिन रात मेहनत कर आईआईटी की प्रवेश परीक्षा दी, पर वो कामयाब नहीं हो सकीं।

निधि के संघर्ष पर फ्रांस के फिल्म निर्माता ने बनाई फिल्म

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निधि - फोटो : अमर उजाला
मजबूरी में निधि ने सरकारी कॉलेज में बीएससी के लिए आवेदन किया। लेकिन एक दिन अखबार में सुपर 30 के बारे में पता चला, फिर क्या था स्कूल की प्रधानाचार्य की मदद से निधि ने वहां दाखिला कैसे पाया जा सकता है, इसके बारे में पता लगाया।

आखिरकार निधि की कोशिश सफल हुई और वो सुपर 30 में पहुंचीं और आईआईटी क्रैक किया। बीटेक करने के बाद निधि को गुरुग्राम के मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर बनने का मौका मिला। निधि के संघर्ष पर फ्रांस के फिल्म निर्माता ने फिल्म भी बनाई है, 90 मिनट की फिल्म में दुनिया भर से चार विशेष कहानियों को शामिल किया गया है। उनमें निधि भी शामिल है।
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