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आयोजन हुए वर्चुअल, न भाव बदला न लगाव
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कोरोना संक्रमण काल ने पुरानी परंपराओं को वर्चुअल भले कर दिया हो, लेकिन भाव व लगाव नहीं बदला है। बनारस घराने में जहां गुरु शिष्य परंपरा के तहत गंडा बंधन के आयोजन होंगे, वहीं शिष्य भी वर्चुअल गुरु के दर्शन करेंगे।
काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल ने बताया कि काशी ज्ञान-विज्ञान की नगरी है यहां अनेकों विद्वान एक साथ अज्ञानता के अंधकार को मिटाते हैं। कहा जाता है कि गुरु सूर्य हैं, गुरु चंद्र हैं, गुरु ही पूर्ण प्रकाश हैं। भगवत गीता में वर्णित हर एक श्लोक को आज के जीवन से जोड़ कर बताने वाले गुरु विरले ही मिलते हैं।
नव युवाओं के पथ प्रदर्शक, बेटियां कर रहीं नाम रोशन
चार बार गिनीज रिकॉर्ड में दर्ज कराने वाले डॉ. जगदीश पिल्लई लेखक, संगीतकार, कवि एवं वैदिक रिसर्चर हैं। बीएचयू में नौकरी छोड़कर व्यापार में खुद अपना भाग्य आजमाया। कम समय में फर्श से अर्श तक कि सफलता हासिल की। इसके बाद सामाजिक कार्य में उतर गए। उनके पांच शिष्यों ने वर्ल्ड रिकॉर्डस आफ इंडिया, इंडियन बुक आफ रिकॉर्ड और गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया। इसमें पूनम राय, श्रेया गर्ग, रोशनी यादव, शालिनी सिंह और नेहा सिंह शामिल हैं।
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संक्रमण काल में भी जारी रही संगीत की साधना
सरोद वादक पं. विकास महाराज ने कोरोना काल में भी शिष्यों को प्रशिक्षण देना बंद नहीं किया। देश-विदेश से शिष्य वर्चुअली संगीत की शिक्षा लेते रहे। यश भारती से सम्मानित पं. विकास महाराज ने संक्रमण काल में संगीत के प्रशिक्षण का तरीका तो बदल दिया, लेकिन गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता नहीं बदला। सितारवादक पं. देवब्रत मिश्र ने भी बनारस घराने की संगीत परंपरा का प्रवाह थमने नहीं दिया। संगीत की साधना के साथ ही उनके प्रशिक्षण का कार्यक्रम आज भी जारी है।
ललित का टोक्यो ओलंपिक में जाना ही मेरी गुरू दक्षिणा
पूर्व साई कोच परमानंद मिश्रा बताते हैं कि ललित उपाध्याय को 10 साल से हॉकी के गुर सिखा रहा हूं। उसकी लगन और मेहनत को देखते हुए मैंने उन्हें कम उम्र में भारतीय सीनियर टीम के लिए तैयार किया। 2008 में पहली बार भारतीय टीम की ओर मलयेशिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर मेरा और काशी का मान बढ़ाया। टोक्यो ओलंपिक में जाने से पहले ललित ने भावुक होकर फोन किया तो मैंने उससे यही कहा कि तुम्हारा ओलंपिक में चयन होना ही मेरी गुरु दक्षिणा है।
श्रम, साधना और अध्यात्म की धाराओं में गोता लगाते हैं शिष्य
वाराणसी। धर्म नगरी काशी के हिमालय से गुरु शिष्य परंपरा की निकली धाराएं आज भी प्रवाहमान हैं। सगुण और सनातन धारा के साथ निर्गुण धारा भी पुष्पित और पल्लवित हुई। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि काशी में वैष्णव संत रामानंदाचार्य ने विशेष रीति से श्रीराम की उपासना की नींव रखी। आज उनके अनुयायी रामानंदीय या वैष्णव बैरागी कहलाते हैं। यहां पंचगंगा घाट पर उनकी महासमाधि हुई जिसे श्रीमठ के नाम से जाना जाता है। दूसरी धारा में श्रम और साधना की अलख जगाने वाले संतों की लंबी शृंखला है। संत रविदास ने मन चंगा तो कठौती में गंगा.. को साकार करते हुए श्रम और साधना को एक रंग में रंग दिया। संतमत अनुयायी आश्रम मठ गड़वाघाट की समृद्ध गुरु परंपरा पर गौर करें तो श्रम और साधना एक साथ खड़ी दिखेगी।
आदि शंकराचार्य की परंपरा भी काशी में
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों शंकराचार्य पीठ भले ही देश के चारोें कोनों में हों, लेकिन उनकी शाखाएं यहां भी हैं। द्वारिका-ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसे आगे बढ़ा रहे हैं। पुरी मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती अस्सी स्थित आश्रम में अक्सर आते जाते रहते हैं।
वेद शास्त्रों का भी है संरक्षण
करपात्री महाराज द्वारा स्थापित अखिल भारतीय धर्म संघ आज भी वेद शास्त्रों के संरक्षण में संलग्न है। स्वामी शंकर देव ब्रह्मचारी के नेतृत्व में गो सेवा व बटुकों के अध्यापन की व्यवस्था की जाती है। जगद्गुरु विष्णु स्वामी यमुनाचार्य महाराज की शिष्य परंपरा को महामंडलेश्वर संतोष दास मणिकर्णिकाघाट पर आगे बढ़ा रहे हैं।
अघोरपंथ की रमाई धुनी
अघोरेश्वर भगवान राम ने पड़ाव में ज्ञान की गंगा बहाई तो जनसेवा की राह भी दिखाई। आज गुरु पद संभव राम के नेतृत्व में कुष्ठ रोगियों के सेवार्थ किए जा रहे हैं। अघोरपंथ के महापुरुष बाबा कीनाराम द्वारा पौने चार सौ वर्ष पहले स्थापित क्रीं कुंड आज भी विद्यमान है। बाबा सिद्धार्थ गौतम राम परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल ने बताया कि काशी ज्ञान-विज्ञान की नगरी है यहां अनेकों विद्वान एक साथ अज्ञानता के अंधकार को मिटाते हैं। कहा जाता है कि गुरु सूर्य हैं, गुरु चंद्र हैं, गुरु ही पूर्ण प्रकाश हैं। भगवत गीता में वर्णित हर एक श्लोक को आज के जीवन से जोड़ कर बताने वाले गुरु विरले ही मिलते हैं।
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नव युवाओं के पथ प्रदर्शक, बेटियां कर रहीं नाम रोशन
चार बार गिनीज रिकॉर्ड में दर्ज कराने वाले डॉ. जगदीश पिल्लई लेखक, संगीतकार, कवि एवं वैदिक रिसर्चर हैं। बीएचयू में नौकरी छोड़कर व्यापार में खुद अपना भाग्य आजमाया। कम समय में फर्श से अर्श तक कि सफलता हासिल की। इसके बाद सामाजिक कार्य में उतर गए। उनके पांच शिष्यों ने वर्ल्ड रिकॉर्डस आफ इंडिया, इंडियन बुक आफ रिकॉर्ड और गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया। इसमें पूनम राय, श्रेया गर्ग, रोशनी यादव, शालिनी सिंह और नेहा सिंह शामिल हैं।
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संक्रमण काल में भी जारी रही संगीत की साधना
सरोद वादक पं. विकास महाराज ने कोरोना काल में भी शिष्यों को प्रशिक्षण देना बंद नहीं किया। देश-विदेश से शिष्य वर्चुअली संगीत की शिक्षा लेते रहे। यश भारती से सम्मानित पं. विकास महाराज ने संक्रमण काल में संगीत के प्रशिक्षण का तरीका तो बदल दिया, लेकिन गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता नहीं बदला। सितारवादक पं. देवब्रत मिश्र ने भी बनारस घराने की संगीत परंपरा का प्रवाह थमने नहीं दिया। संगीत की साधना के साथ ही उनके प्रशिक्षण का कार्यक्रम आज भी जारी है।
ललित का टोक्यो ओलंपिक में जाना ही मेरी गुरू दक्षिणा
पूर्व साई कोच परमानंद मिश्रा बताते हैं कि ललित उपाध्याय को 10 साल से हॉकी के गुर सिखा रहा हूं। उसकी लगन और मेहनत को देखते हुए मैंने उन्हें कम उम्र में भारतीय सीनियर टीम के लिए तैयार किया। 2008 में पहली बार भारतीय टीम की ओर मलयेशिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर मेरा और काशी का मान बढ़ाया। टोक्यो ओलंपिक में जाने से पहले ललित ने भावुक होकर फोन किया तो मैंने उससे यही कहा कि तुम्हारा ओलंपिक में चयन होना ही मेरी गुरु दक्षिणा है।
श्रम, साधना और अध्यात्म की धाराओं में गोता लगाते हैं शिष्य
वाराणसी। धर्म नगरी काशी के हिमालय से गुरु शिष्य परंपरा की निकली धाराएं आज भी प्रवाहमान हैं। सगुण और सनातन धारा के साथ निर्गुण धारा भी पुष्पित और पल्लवित हुई। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि काशी में वैष्णव संत रामानंदाचार्य ने विशेष रीति से श्रीराम की उपासना की नींव रखी। आज उनके अनुयायी रामानंदीय या वैष्णव बैरागी कहलाते हैं। यहां पंचगंगा घाट पर उनकी महासमाधि हुई जिसे श्रीमठ के नाम से जाना जाता है। दूसरी धारा में श्रम और साधना की अलख जगाने वाले संतों की लंबी शृंखला है। संत रविदास ने मन चंगा तो कठौती में गंगा.. को साकार करते हुए श्रम और साधना को एक रंग में रंग दिया। संतमत अनुयायी आश्रम मठ गड़वाघाट की समृद्ध गुरु परंपरा पर गौर करें तो श्रम और साधना एक साथ खड़ी दिखेगी।
आदि शंकराचार्य की परंपरा भी काशी में
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों शंकराचार्य पीठ भले ही देश के चारोें कोनों में हों, लेकिन उनकी शाखाएं यहां भी हैं। द्वारिका-ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसे आगे बढ़ा रहे हैं। पुरी मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती अस्सी स्थित आश्रम में अक्सर आते जाते रहते हैं।
वेद शास्त्रों का भी है संरक्षण
करपात्री महाराज द्वारा स्थापित अखिल भारतीय धर्म संघ आज भी वेद शास्त्रों के संरक्षण में संलग्न है। स्वामी शंकर देव ब्रह्मचारी के नेतृत्व में गो सेवा व बटुकों के अध्यापन की व्यवस्था की जाती है। जगद्गुरु विष्णु स्वामी यमुनाचार्य महाराज की शिष्य परंपरा को महामंडलेश्वर संतोष दास मणिकर्णिकाघाट पर आगे बढ़ा रहे हैं।
अघोरपंथ की रमाई धुनी
अघोरेश्वर भगवान राम ने पड़ाव में ज्ञान की गंगा बहाई तो जनसेवा की राह भी दिखाई। आज गुरु पद संभव राम के नेतृत्व में कुष्ठ रोगियों के सेवार्थ किए जा रहे हैं। अघोरपंथ के महापुरुष बाबा कीनाराम द्वारा पौने चार सौ वर्ष पहले स्थापित क्रीं कुंड आज भी विद्यमान है। बाबा सिद्धार्थ गौतम राम परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।