काशी में आयोजित धर्म संसद का समापन, अब शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जारी करेंगे धर्मादेश
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धर्म संसद 1008 के तीसरे दिन मंगलवार को भी गो, गंगा और राम मंदिर निर्माण के अलावा काशी में विकास के नाम पर तोड़े जा रहे मंदिरों का मुद्दा छाया रहा है। सभी धर्माचार्यों और धर्मांसदों ने कहा कि मंदिर निर्माण और मंदिर का स्थानांतरण संतों का काम है। इसमें नेताओं और अधिकारियों की रुचि धर्मानुकूल नहीं है।
हालांकि तीन दिन चली धर्म संसद में पास हुए प्रस्ताव और इसमें लिए गए फैसले मंगलवार को जारी नहीं हुए। धर्म संसद के परम धर्माधीश ज्योतिष एवं शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद बुधवार को धर्मादेश देंगे।
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संसद की तर्ज पर चल रहे तीन दिवसीय धर्म संसद की 18 घंटे तक चली कार्यवाही में पहले दिन तीन प्रस्ताव हुए। इसके बाद किसी भी प्रस्ताव पर मुहर नहीं लगी। तीसरे दिन भी गो, गंगा और राम मंदिर के मुद्दे के अलावा काशी में विकास के नाम पर तोड़े जा रहे मंदिरों का मुद्दा ही उठा।
इसके अलावा धर्मांतरण व धर्म में व्याप्त राजनीतिकरण को लेकर वक्ताओं ने कहा कि धर्म को वर्तमान में सत्ता प्राप्ति का बेहतर साधन बना लिया गया है। राजनीतिक पार्टियों को जो कार्य करना चाहिए उस काम को छोड़कर धर्म के कार्यों में व्यस्त हो रहे हैं। राजनीतिक दल अपना कार्य छोड़कर मंदिर और मस्जिद में जुट गए हैं। सभी संतों ने कहा कि अब सभी संत प्रयागराज में आयोजित धर्म संसद में मिलेंगे।
बिना मंदिर सरकार किसी काम की नहीं
अयोध्या से आए संतों ने कहा कि बिना राम मंदिर निर्माण के सरकार किसी काम की नहीं है। धर्म संसद के आखिरी दिन मंगलवार को पहले सत्र में सावित्री देवी ने गंगा और संस्कृति को जिंदा रखने की अपील की। सुबह शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य प्रतिनिधि व प्रवर धर्माधीश स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पूजन कर सत्र की शुरुआत की। तेलंगाना से आई एक महिला ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सवाल उठाया।
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कहा, वैष्णो देवी में महिलाओं को प्रवेश मिलता है तो सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर क्यों रोक है। केरल के संतों ने अपील करते हुए कहा कि केरल सरकार द्वारा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर होने वाली सांप्रदायिकता को रोकने के लिए कदम उठाए जाएं। छत्तीसगढ़ से आए महंत बालकदास ने गाय संरक्षण पर बात की।
सभी धर्मों के तौर-तरीके व विचार अलग हैं। सभी का आदर करना ही सनातन धर्म का कर्तव्य है। हमें किसी को दुख पहुंचाने का विचार छोड़, उनके अच्छे विचारों को आत्मसात करना चाहिए। सनातन धर्मी होने के नाते हमारी जिम्मेदारी सबसे अधिक है।