Varanasi: छेड़खानी और एससी-एसटी एक्ट के केस में BHU पत्रकारिता विभाग के हेड बरी, 9 साल पहले हुआ था मुकदमा
बीएचयू पत्रकारिता विभाग के हेड प्रोफेसर शिशिर बसु के खिलाफ मार्च 2013 में छेड़खानी और एससी-एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज हुआ था। अदालत ने साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
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विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) संजीव कुमार सिन्हा की अदालत ने बीएचयू के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के हेड प्रो. शिशिर बसु को छेड़खानी सहित अन्य आरोपों में साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी ने पक्ष रखा।
अभियोजन पक्ष के अनुसार बीएचयू के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने 16 मार्च 2013 को चीफ प्रॉक्टर को एक शिकायती पत्र दिया था। आरोप था कि विभाग के छह छात्र-छात्राएं उन्हें जातिसूचक गाली देते हैं। इसके साथ ही उनकी अश्लील फोटो निकाल कर उन्हें प्रताड़ित करते हैं। चारों छात्रों पर तत्काल कार्रवाई की जाए।
यह सब करने के लिए छात्रों को पत्रकारिता विभाग के हेड प्रोफेसर शिशिर बसु उकसाते हैं। प्रो. शिशिर बसु के साथ ही सभी पर तत्काल कानूनी कार्रवाई नहीं की गई तो वह आमरण अनशन शुरू करेंगी। यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने असिस्टेंट प्रोफेसर के शिकायती पत्र को लंका थाने भेज दिया था। उसके आधार पर लंका थाने में प्रो. बसु के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।
मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की तो कोर्ट ने 19 जून 2013 को संज्ञान लिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोप के तहत अपराध, दिन, समय, घटना और घटना किए जाने के तरीके को साबित करने में अभियोजन पूरी तरह से असफल रहा है। इसलिए अभियुक्त प्रो. शिशिर बसु सभी आरोपों से दोषमुक्त किए जाने योग्य है। जिसके बाद अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।