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जौनपुर ने छह सौ साल में कई बदलाव देखें हैं, कोरोना वायरस के संकट में बयां करता अपनी कहानी

Sat, 25 Apr 2020 10:28 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sat, 25 Apr 2020 10:28 AM IST
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Coronavirus jaunpur history 14th dicades mughal time
जौनपुर।

जौनपुर शहर ने छह सौ सालों में कई बदलाव देखे हैं। कई महामारियों का दंश झेला। मगर हर मुश्किल को मात देकर हर बार नई ऊर्जा से खड़ा हुआ। इस कोरोना संकट के दौर में भी यह शहर पूरे ऊर्जा और उत्साह के साथ सुखद और सुरक्षित भविष्य बनाने के लिए जुटा हुआ है। 24 अप्रैल को यहां लॉकडाउन को 30 दिन पूरे हो चुके हैं। इन तीस दिनों में आए बदलावों पर जौनपुर की कहानी, उसी की जुबानी।

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मैं जौनपुर हूं। 14वीं शताब्दी में मेरा सृजन हुआ। तुगलक शासक फिरोज शाह ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक उर्फ जौना खां की याद में बसाया था। तब से अनवरत इतिहास के हर पल का गवाह हूं। मैंने शर्की शासन की भव्यता भी देखी है और मुगल काल का सूरज भी। गुलामी की जंजीरों में जकड़ी मां भारती की पीड़ा सुनी है तो उन जंजीरों को तोड़ने के लिए आतुर सपूतों की हुंकार भी।
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मैंने(जौनपुर) आजादी के मतवालों की टोलियां भी देखी हैं और अपनी सरजमीं पर शान से लहराते तिरंगे का गौरव भी महसूस किया है। शेरशाह सूरी जैसा योद्धा मेरे आंगन में खेले हैं। तहजीब और तालीम के केंद्र के रूप में मैं विख्यात रहा हूं। शर्की और मुगल काल में बनी इमारतें आज भी मेरे गौरव का बखान करती हैं। इसे देख हर शहरवासी इतराता है तो शानदार इतिहास पर फूले नहीं समाता।

प्लेग और हैजा जैसी महामारी भी हमने झेली है। हर काल और परिस्थिति में यह शहर कभी शांत नहीं रहा। छह सौ साल में भी सड़कों पर रौनक और गलियों में उत्साह बरकरार रहा है। हमने संयम और सौहार्द कभी भी नहीं छोड़ा। प्रेम, भाईचारा और उत्सवधर्मिता हमारी संस्कृति रही है। इसके बूते ही हमने हर चुनौती का सामना किया है। मौजूदा वक्त संकट का है, लेकिन हमें हिम्मत नहीं हारनी है। कोरोना के संकट को भी हम हराएंगे। धैर्य और संयम की परीक्षा में कुछ दिन और डटे रहें। इसके बाद फिर से सुनहरा भविष्य हमारा होगा।

शर्की काल में जौनपुर को मिली नई पहचान
शहर के रासमंडल स्थित हिंदी भवन के अध्यक्ष और लेखक अजय सिंह बताते हैं कि जौनपुर का समृद्ध इतिहास रहा है। तुगलक से लेकर मुगल तक यहां की कला, संस्कृति के दीवाने रहे हैं। आधुनिक भारत में भी यहां संगीत, साहित्य और कला का खूब विकास हुआ। जौनपुर को संवारने में सबसे ज्यादा योगदान शर्की शासकों का है, जिन्होंने इसे शिक्षा, संगीत और कला के केंद्र के रूप में स्थापित किया।

वह बताते हैं कि आजादी के बाद प्लेग रूपी महामारी का कहर हमने देखा है। तब इतने संसाधन नहीं थे, फिर भी शहर ने पूरे संयत भाव से इसका मुकाबला किया। कोरोना की महामारी उससे भी बड़ी और भयावह है, मगर यकीन है कि यहां के लोग इससे भी बखूबी निपटेंगे। टीडी कॉलेज के प्रबंधक अशोक सिंह और पूर्व विधायक हाजी अफजाल भी कोरोना को नियंत्रित रखने में शहरवासियों के धैर्य और संयम की सराहना करते हैं। उनका कहना है कि जिस तरह यहां के लोग सतर्कता बरत रहे हैं, यह दूसरों के लिए भी प्रेरणादायक है।

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