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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Chhath Puja 2023: Nahay Khay starts from 17th November auspicious time to offer Arghya Sun

Chhath Puja 2023: नहाय खाय 17 नवंबर से शुरू, जानिए- खरना और सूर्यदेव को अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त

Thu, 16 Nov 2023 02:22 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Thu, 16 Nov 2023 02:22 PM IST
सार

ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी 16 नवंबर को दिन में 12:35 बजे लगेगी और व्रत का प्रथम नियम-संयम नहाय खाय 17 नवंबर से शुरू होगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 17 नवंबर को दिन में 11:04 बजे लगेगी।

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Chhath Puja 2023: Nahay Khay starts from 17th November auspicious time to offer Arghya Sun
छठ पूजा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सौभाग्य, आरोग्य और सर्वसुख प्रदान करने वाले छठ व्रत के अनुष्ठान 17 नवंबर से शुरू हो जाएंगे। कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक छठ पर्व के विविध अनुष्ठान, नियम और संयम निभाए जाएंगे। अस्ताचलगामी सूर्यदेव को पहला अर्घ्य 19 नवंबर को अर्पित किया जाएगा। वहीं, उगते हुए सूर्यदेव को 20 नवंबर को अर्घ्य देकर चार दिवसीय छठव्रत का समापन होगा।

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ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी 16 नवंबर को दिन में 12:35 बजे लगेगी और व्रत का प्रथम नियम-संयम नहाय खाय 17 नवंबर से शुरू होगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 17 नवंबर को दिन में 11:04 बजे लगेगी। खरना 18 नवंबर को होगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 18 नवंबर शनिवार को सुबह 9:19 बजे लगेगी। 19 नवंबर यानी रविवार को व्रत के तृतीय संयम के तहत शाम को अस्त होते हुए सूर्य को प्रथम अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 19 नवंबर को सुबह 7:24 मिनट पर लगेगी। 20 नवंबर सोमवार को उगते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।
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नहाय-खाय के साथ होगी महापर्व छठ की शुरुआत
प्रथम संयम के दिन सात्विक भोजन जिसमें लौकी की सब्जी, चने की दाल और हाथ की चक्की से पीसे हुए गेहूं के आटे की पूड़ियां ग्रहण की जाती हैं। इसे नहाय-खाय के नाम से जानते हैं। अगले दिन 18 नवंबर को शाम को स्नान के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाएगा। प्रसाद के रूप में नए चावल से बने गुड़ की खीर ग्रहण की जाती है। इसे खरना कहते हैं। इसके बाद व्रत रखकर 19 नवंबर की शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाता है। भगवान सूर्यदेव की आराधना के साथ ही षष्ठी देवी की प्रसन्नता के लिए लोकगीत गाए जाते हैं। सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
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धार्मिक मान्यता

पं. अजय शर्मा ने बताया कि सूर्य षष्ठी के व्रत से पांडवों को अपना खोया हुआ राजपाट और वैभव प्राप्त हुआ था। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी तिथि के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का प्रादुर्भाव हुआ था। पौराणिक मान्यता है कि भगवान राम के वनवास से लौटने पर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि के दिन उपवास रखकर प्रत्यक्ष भगवान सूर्यदेव की आराधना की और सप्तमी तिथि के दिन व्रत पूर्ण किया था।

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