बिस्मिल्लाह खां की जयंती: 93 साल की उम्र में उस्ताद ने राष्ट्रपति भवन में दी थी अंतिम प्रस्तुति, जानें खासियत
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बनारस की गलियों के शान थे। उनकी आवाज सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आया करते थे। राष्ट्रपति भवन में उन्होंने नामचीन कलाकारों के साथ युगलबंदी की थी।
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Ustad Bismillah Khan: अब भी राग यमन के सुरों को ढूंढ रहा हूं। आज भी उस पर सुर नहीं लगा पाता हूं। पूजा करते समय अपने लिए प्रार्थना कर लेना और मेरे लिए प्रार्थना कर लेना कि मेरे सुरों को तासीर मिल जाए।
राष्ट्रपति भवन में अंतिम प्रस्तुति के बाद भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से जब पूछा गया कि क्या अब भी कोई ऐसी ख्वाहिश रह गई है, जिसे आप पूरा करना चाहते हैं तो उन्होंने यही जवाब दिया था। 93 साल की अवस्था में इस बात को कहने वाला कोई साधारण इंसान हो भी नहीं सकता था।
उपशास्त्रीय गायिका डॉ. सोमा घोष के साथ 2006 में राष्ट्रपति भवन में उस्ताद ने अपनी अंतिम प्रस्तुति दी थी। डॉ. सोमा घोष ने इस कार्यक्रम से जुड़े अपने संस्मरणों को साझा करते हुए बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का सपना था कि हम लोगों की जुगलबंदी राष्ट्रपति भवन में हो।
राष्ट्रपति भवन से खां साहब से संपर्क किया गया तो उन्होंने 30 लाख रुपये की मांग रखी थी। कहा था कि एक पैसा कम नहीं करेंगे। इसके बाद राष्ट्रपति भवन से मुझे बुलाया कि यह कैसे होगा? आपने वादा किया था कार्यक्रम का। मैंने वहीं से अब्बा को फोन किया तो घर में किसी ने उठाया। कहा कि अब्बा को हम फोन नहीं दे सकते हैं। वह बाथरूम में गिर गए हैं। उन्हें चोट आई है। वह बहुत गुस्से में हैं।
मैंने कहा कि आपको कुछ नहीं करना है, आप बस कान के पास फोन लगा दो। उन्होंने वैसा ही किया। मैंने कहा, अब्बा आपको हुकूमत के लिए आना है। तो उन्होंने कहा कि क्या कोई हुकूमत जिंदा है? अकबर बादशाह जिंदा हैं क्या? मैं किसी के लिए नहीं बजाऊंगा। इसके बाद उन्होंने पूछा तुमको गाना है क्या? तो मैंने कहा हां।
उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए आऊंगा। उन्होंने एक पैसे की मांग नहीं की, क्योंकि उन्होंने कहा था कि तुम्हारे लिए मैं कुछ भी करुंगा। पिता का फर्ज निभाऊंगा और अंत तक उन्होंने निभाया। चोट लगने के बाद भी वह राष्ट्रपति भवन में कार्यक्रम के लिए पहुंचे थे। ऐसे ही आदमी देवता बन जाता है, वैल्यू ऑफ कमिटमेंट... से। मैंने उनकी तरह देवता समान आदमी नहीं देखा। उन्होंने पूरी जिंदगी एक पिता का फर्ज निभाया। उनसे मुझे हजारों टिप्स मिले लेकिन जो मुझे बहुत पसंद है वह है उनका वैल्यू ऑफ कमिटमेंट।
बनारस की कजरी में वह जीते थे
डॉ. सोमा घोष ने बताया कि उस्ताद का सबसे पसंदीदा राग यमन और विहाग था। राष्ट्रपति भवन में हम लोगों ने राग विहाग में ही युगलबंदी की थी। वह बनारस की कजरी में जीते थे। चाहे बारिश हो या न हो, वह कहीं भी कार्यक्रम में जाते थे तो कहते थे कि मैं कजरी जरूर बजाऊंगा। खान साहब के साथ तीन दिन हम लोग राष्ट्रपति भवन में थे। उसके तीन चार महीने बाद उनका इंतकाल हो गया।
संगत के दौरान बेटे को बैठा देते थे पीछे
अब्बा हमेशा कहते थे कि उन्होंने तो महादेव को साक्षात देखा है। एक नहीं तीन-तीन बार। उन्होंने जब यह बात अपने मामू को बताई तो उन्होंने उनसे कहा था कि यह बात किसी से मत कहना। उस्ताद ने बताया था कि अंतिम बार जब उन्होंने महादेव को देखा तो उन्होंने उनसे कहा था कि मैं तो दाने-दाने को मोहताज हूं। इसके बाद आवाज आई कि जाओ कल से मत आना।
इसके बाद जो बिस्मिल्लाह निकले तो फिर पूरी दुनिया ने उनके संगीत की तासीर को महसूस किया। एक साधारण सा इंसान और उसने शहनाई को कहां से कहां पहुंचा दिया। जब वह मेरे साथ संगत करते थे तो अपने बेटे को पीछे बैठा देते थे। रिहर्सल होता था तो मुझे अपने पास बिठाते और अपने बेटे को जमीन पर।
जमीन पर बैठकर भी बजा लेंगे
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने संकटमोचन संगीत समारोह में प्रस्तुति देने के लिए मेरे दादा पं. अमरनाथ मिश्र से निवेदन किया था। उस्ताद ने कहा था कि वह जमीन पर कहीं भी बैठकर बजा लेंगे। उस दौर में संकट मोचन संगीत समारोह में मुसलमानों का प्रवेश नहीं था तो उन्होंने मना कर दिया। हालांकि बाद में उनके पोते ने संकटमोचन संगीत समारोह में शहनाई वादन किया था।
फुटबॉल ने दी शहनाई के लिए दमकशी
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि शहनाई दमकशी का साज है। बिना दम के इसे नहीं बजाया जा सकता है। उस्ताद तो शहनाई वादक के साथ ही बहुत अच्छे फुटबॉलर भी थे। यही कारण था कि शहनाई के लिए सांसों का दम उनको खेल से मिला। शहनाई बजाने के लिए जिस साधना की जरूरत होती है उसे उन्होंने रोजे से हासिल की।
कभी बालाजी मंदिर की मढ़ी तो कभी बड़ा गणेश की चौखट पर शहनाई बजाने वाले उस्ताद ने लाल किले की प्राचीर से भी देश को अपनी शहनाई की धुन सुनाई थी। पांच वक्त के नमाजी भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की सादगी का अंदाज ऐसा था कि वह बधाई बजाने के लिए चबूतरे पर भी बैठ जाते थे तो कहीं कबीरचौरा अस्पताल की जमीन पर।