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असि के उद्धार को आगे आया बीएचयू
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 04 Jun 2016 01:53 AM IST
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काशी में दम तोड़ने के कगार पर पहुंची मोक्षदायिनी असि नदी पुनर्जीवित करने की योजना जल्द तैयार की जाएगी। इस भगीरथ प्रयास के लिए महामना की तपस्थली बीएचयू ने कदम आगे बढ़ाया है। असि के बंद चैनलों को खोलने के साथ ही असि-गंगा संगम को नए सिरे से बहाल कराने की पहल की जाएगी। इस योजना को सतह पर लाने के लिए बीएचयू में नदी विशेषज्ञों, इंजीनियरों और पर्यावरणविदों की पहली बैठक सात जून को होगी।
बीएचयू ने माना है कि असि के बिना काशी का न तो पर्यावरण सुधरेगा और न भूगर्भीय जल के प्रबंधन की व्यवस्था ही सुदृढ़ रह पाएगी। गिरते भूजल स्तर और बिगड़ते वातावरण को इसी चिंता से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके अलावा असि नदी के बर्बाद होने से काशी के आध्यात्मिक स्वरूप और महत्व पर असर पड़ना स्वाभाविक है। इन गंभीर दुष्परिणामों को देखते हुए बीएचयू ने असि नदी के पुनरुद्धार की योजना बनाने का निर्णय किया है। इसके लिए केंद्रीय गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय से भी बात की जाएगी।
कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी ने गंगा पर शोध और अध्ययन के लिए हाल ही में मालवीय गंगा नदी विकास एवं जल संसाधन प्रबंधन शोध केंद्र के चेयरमैन प्रो. बीडी त्रिपाठी को जिम्मेदारी सौंपी है। प्रो. त्रिपाठी ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अलावा केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों से असि नदी के चैनलों को चिह्नित करने के लिए संपर्क साधा है। सात जून को असि के पुनरुद्धार पर होने वाली अहम बैठक में मिशन क्लीन गंगा के निदेशक के अलावा आईआईटी रुड़की के प्रो. विनोद तारे समेत देश के कई नामचीन विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। इसमें आठ किलोमीटर लंबी असि नदी को रिचार्ज करने की कवायद पर मंथन किया जाएगा, ताकि योजना को अमली जामा पहनाया जा सके।
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असि नदी काशी की अस्मिता और पहचान की द्योतक है। वरुणा और असि को मिलाकर ही इस शहर का नाम वाराणसी पड़ा लेकिन बीते दो दशक में शहर के नालों को इस नदी में मिलाकर और कूड़े-कचरे से पाटकर नाले में तब्दील कर दिया गया है। कई जगहों पर इसके चैनल बंद कर दिए गए हैं। असि-गंगा संगम को पाटकर इसकी धारा नगवा नाले में मिला दी गई है। नदी की रक्षा के लिए साझा संस्कृति मंच और असि नदी मुक्ति आंदोलन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता संघर्ष कर रहे हैं।
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बीएचयू ने माना है कि असि के बिना काशी का न तो पर्यावरण सुधरेगा और न भूगर्भीय जल के प्रबंधन की व्यवस्था ही सुदृढ़ रह पाएगी। गिरते भूजल स्तर और बिगड़ते वातावरण को इसी चिंता से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके अलावा असि नदी के बर्बाद होने से काशी के आध्यात्मिक स्वरूप और महत्व पर असर पड़ना स्वाभाविक है। इन गंभीर दुष्परिणामों को देखते हुए बीएचयू ने असि नदी के पुनरुद्धार की योजना बनाने का निर्णय किया है। इसके लिए केंद्रीय गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय से भी बात की जाएगी।
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कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी ने गंगा पर शोध और अध्ययन के लिए हाल ही में मालवीय गंगा नदी विकास एवं जल संसाधन प्रबंधन शोध केंद्र के चेयरमैन प्रो. बीडी त्रिपाठी को जिम्मेदारी सौंपी है। प्रो. त्रिपाठी ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अलावा केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों से असि नदी के चैनलों को चिह्नित करने के लिए संपर्क साधा है। सात जून को असि के पुनरुद्धार पर होने वाली अहम बैठक में मिशन क्लीन गंगा के निदेशक के अलावा आईआईटी रुड़की के प्रो. विनोद तारे समेत देश के कई नामचीन विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। इसमें आठ किलोमीटर लंबी असि नदी को रिचार्ज करने की कवायद पर मंथन किया जाएगा, ताकि योजना को अमली जामा पहनाया जा सके।
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असि नदी काशी की अस्मिता और पहचान की द्योतक है। वरुणा और असि को मिलाकर ही इस शहर का नाम वाराणसी पड़ा लेकिन बीते दो दशक में शहर के नालों को इस नदी में मिलाकर और कूड़े-कचरे से पाटकर नाले में तब्दील कर दिया गया है। कई जगहों पर इसके चैनल बंद कर दिए गए हैं। असि-गंगा संगम को पाटकर इसकी धारा नगवा नाले में मिला दी गई है। नदी की रक्षा के लिए साझा संस्कृति मंच और असि नदी मुक्ति आंदोलन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता संघर्ष कर रहे हैं।